इलाहाबाद। पद्मश्री शम्सुर्रहमान फारुकी का कहना है कि गजल के लिए तुकांत जरूरी है। कहा, जिस जुबां में तुकांत की कमी हैं, वह गजल को ठीक तरह से नहीं कह सकती हैं। दुनिया की हर जुबां गजल नहीं कह सकती है जिसमें तुक का खजाना होगा, वही जुबां गजल को ठीक तरह से कह सकेगी। अरबी, फारसी, तुर्की, उजबेकी, मराठी, नेपाली सेंट्रल एशिया के हर मुल्क की जुबान में गजल कही जा रही है जबकि अंग्रेजी, चाइनीज जैसी भाषाओं में ऐसी कूबत नहीं है।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी में अंजुमन प्रकाशन की ओर से तीन दिवसीय ‘जश्न-ए-गज़ल’ का उद्घाटन करने के बाद उन्होंने गजल की परंपरा पर चर्चा की और उसमें आ रहे भटकाव को भी रेखांकित किया। कहा, जैसे-हमारा दिल इश्क में फंस गया। किसी एक ने ऐसी गजलें कहने की परंपरा शुरू तो वह आगे बढ़ गई। यह एक बुनियादी फितूर है। गजल का दामन बहुत बड़ा है। इस दौरान उन्होंने पत्रिका ‘अंजुमन,’ वीनस केसरी की पुस्तक ‘गजल की बाबत,’ फरमूद इलाहाबादी की पुस्तक ‘जा-नशी अकबर का हूं मै,’ सुरेश कुमार शेष की पुस्तक ‘मौसम के हवाले से,’ राकेश दिलबर की पुस्तक ‘लफ्ज पत्थर हो गए’ का विमोचन किया।
उद्घाटन सत्र में नेपाल के ज्ञानुवाकर पौडेल, आवाज शर्मा आदि ने भी गजल को लेकर राय पेश की। अतिथियों का स्वागत आयोजन समिति के अध्यक्ष एमए कदीर और संचालन यश मालवीय ने किया। उद्घाटन सत्र के बाद उर्दू गजलगोई, आचंलिक भाषाओं में गजल नामक दो सत्रों में भी गजल पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में अहमदाबाद के प्रोफेसर सुल्तान अहमद, मशहूर गजलकार एहतराम इस्लाम ने भी उर्दू गजल की खूबियों, बारीकियों को बताया।
एकेडेमी सभागार में सुबह 11 बजे ‘हिन्दी भाषा की गजल की अस्मिता के प्रश्न’ और दिन में 2.30 बजे से ‘कुछ हाशिये के विषय’ पर चर्चा। दिन में तीन बजे से गज़ल पाठ।