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अफसरों की खुन्नस, अव्यवस्था से रैंकिंग में पिछड़ा शहर

Fri, 05 May 2017 02:05 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद।
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साल भर पहले ही स्वच्छ सर्वेक्षण में देश के टॉप मूवर्स शहरों की सूची में 22 वां स्थान पाने वाली संगमनगरी इस बार रैंकिंग में गोता लगा 247 पर पहुंच गई। अफसरों की खुन्नस और अव्यवस्था से शहर सर्वेक्षण के प्रमुख पांच बिंदुओं में पिछड़ गया। हैरान करने वाली बात है कि शहर में नगर निगम सालाना सफाई मद में करीब 25 करोड़ रुपये खर्च करता है। 3000 सफाई कर्मियों की भारी भरकम फौज और अत्याधुनिक मशीनों के साथ पूरे संसाधन हैं फिर भी हम अपना पहले की तरह सम्मान नहीं बचा पाए। अफसर इसका ठीकरा सफाई कार्य में लगी कंपनी हरीभरी पर फोड़ रहे हैं।
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राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले स्वच्छ सर्वेक्षण में 500 शहरों को शामिल किया गया। कार्यआधार जांचने के लिए पांच बिंदु तय किए गए। फिलहाल सभी पर यहां काम हो रहा है लेकिन कागज पर। डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन लगभग ठप है। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की व्यवस्था पटरी से उतरी है। कूड़े से खाद बनाने का काम फिलहाल बंद है। कूड़ा अड्डे बदहाल हैं और बदबू से आसपास संक्रमण फैल रहा है। कूड़े की उठान भी पहले की तरह नहीं है।

शहर खुले में शौच (ओडीएफ) मुक्त भी नहीं हो पाया। रात में प्रमुख बाजारों में सफाई का नया प्रयाग अब सफल है लेकिन अकेले इस कार्य से रैंकिंग नहीं बनती।
शायद यही कारण है कि 11,12,554 की आबादी पर किए गए सर्वेक्षण में सिर्फ 3946 लोगों ने अपना फीडबैग दिया। कंप्यूटर जी ने आंकड़ा निकाला तो शहर को सिर्फ 894 अंक मिले। नतीजा सामने है कि तीर्थराज प्रयाग यानि अपना इलाहाबाद इस बार अव्यवस्था के कारण स्वच्छ सर्वेक्षण की रैकिंग में काफी पिछड़ गया।
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इलाहाबाद को स्वच्छ सर्वेक्षण में राष्ट्रीय स्तर पर भले ही 247 वां स्थान मिला हो लेकिन सूबे में उसकी रैंकिंग तसल्ली देने वाली है। इस सूची में पहला नाम वाराणसी का है। अलीगढ़, झांसी, कानपुर, सहारनपुर, जौनपुर के बाद सूबे में सातवां स्थान हासिल करने वाले इलाहाबाद ने राजधानी लखनऊ को पीछे छोड़ दिया है।

नगर निगम ने शहर की सफाई व्यवस्था के लिए हरी-भरी कंपनी से करार किया था। करीब दो साल पहले कंपनी ने काम शुरू किया तो सफाई व्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर आने लगी। शहर के लगभग आधे से ज्यादा मोहल्लों में डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन का काम होने लगा। निगम के बसवार प्लांट में कूड़े से खाद और प्लास्टिक से दाने बनाए जाने लगे। सिर्फ कूड़े से बिजली उत्पादन का काम शुरू नहीं हो पाया। बात फंस गई भुगतान पर। यहीं से शुरू हुई रार के कारण हरीभरी ने काम बंद कर दिया। इस कारण स्वच्छ सर्वेक्षण में इलाहाबाद की रैंकिंग में लुटिया डूब गई।

करार के मुताबिक संसाधन देने के साथ नगर निगम को हरीभरी को काम के एवज में एक करोड़ 20 लाख रुपये का भुगतान साल भर में करना था। निगम ऐसा नहीं कर सका। पिछले दिनों जब भुगतान हुआ तो पार्षदों ने खराब काम करने का आरोप लगाकर हंगामा किया। सहयोग न मिलने से त्रस्त कंपनी के अफसरों ने काम करने से असमर्थता जता निगम को नोटिस दिया। इस पर तो तूफान मच गया। निगम सदन में मामला उठा और कंपनी से करार रद्द करने का प्रस्ताव पारित किया गया। कंपनी के अफसरों ने भी बांह सिकोड़ नगर आयुक्त की अध्यक्षता में होने वाली बैठक में आने से इनकार कर दिया। तब नगर आयुक्त ने कहा था कि कंपनी से करार रद्द किया जाएगा। अब नतीजा सामने है। हरीभरी के अफसरों का दावा है कि पिछली बार इलाहाबाद को मिला स्वच्छता पुरस्कार उसके काम का रिपोर्ट कार्ड था।

नगर आयुक्त शेष मणि पांडेय की माने तो हरी भरी ने बसवार प्लांट में पिछले साल 2016 से ही काम करना बंद कर दिया था। इस बारे पूछताछ करने पर गोलमोल जवाब मिला। पार्षद शिवशेवक सिंह ने भी आरोप लगाया था कि कंपनी ने वहां लगी करोड़ों की लागत वाले प्लांट में छेड़छाड़ कर उसे खराब कर दिया। कूड़े से खाद बनाने वाली मशीन में चेन की जगह बेल्ट लगा मनमानी की गई। जिसकी वजह से प्लांट ठप हो गया। हरीभरी के अफसर इससे इनकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि भुगतान न होने के कारण कंपनी कई करोड़ के कर्ज में डूब गई।

 स्वच्छ सर्वेक्षण में रैंकिंग फिसलने से हरीभरी के पक्ष में माहौल बन गया है। बृहस्पतिवार को कमिश्नर आशीष गोयल ने अपने सभागार में हुई बैठक में निगम अफसरों के पेच कसे। महापौर ने भी पक्ष रखते हुए शहर की पटरी से उतरी सफाई व्यवस्था को सुधारने के लिए हरीभरी को काम करने के लिए एक मौका और देने का प्रस्ताव रखा। नगर आयुक्त शेष मणि पांडेय ने हरीभरी की लापरवाहियों पर सवाल उठाए। लंबी चर्चा के बाद कमिश्नर ने नगर आयुक्त को निर्देश दिया है कि बैठकर बात कर लें। हरीभरी को एक मौका और दें। इस बार हरीभरी ने गड़बड़ी की तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

 नगर निगम के आंकड़े बताते हैं कि करीब साल भर पहले शहर से कूड़ा उठाने में हर महीने करीब एक लाख डीजल का खर्च किया जाता था। उस वक्त प्रतिमाह करीब 25 हजार मीट्रिक टन कूड़ा भी उठाया गया। अब स्थिति बदली है। कर्मशाला के आंकड़े बताते है कि वर्तमान में प्रतिमाह डीजल की खपत 58 से 60 हजार लीटर है और हर दिन छह से आठ हजार मीट्रिक टन कूड़ा उठाया जा रहा है। ये आंकड़े सिस्टम ध्वस्त होने और व्यवस्था के पटरी से उतरने के संदेह को पुष्ट करते हैं। यही कारण है कि हमारा शहर स्वच्छ सर्वेक्षण की रैंकिंग में पिछड़ गया।

निगम के अफसरों ने हरी भरी को काम करने में सहयोग नहीं दिया। सफाई कार्य से जुड़े लोगों ने कई महत्वपूर्ण निर्देशों की अनदेखी की, इस वजह से हम स्वच्छ सर्वेक्षण की रैंकिंग में पिछड़ गए। हम मायूस जरूर है लेकिन अभी देर नहीं हुई है, जब जागे तब सवेरा। सब मिलकर काम करेंगे तो हम अगली बार टॉप टेन की सूची में शामिल होंगे। - अभिलाषा गुप्ता नंदी, महापौर

हरी भरी ने करार का उल्लंघन कर बिना सूचना काम बंद कर दिया। व्यवस्था पटरी से उतरी तो कंपनी के अफसरों ने काम करने से मना कर दिया। नगर निगम अपने संसाधनों से सफाई व्यवस्था दुरुस्त रखने के लिए प्रयत्नशील है। हम टीम भावना से सब ठीक कर जनहित में बेहतर काम करेंगे। हरीभरी के अफसरों से बात कर काम का महौल बनाया जाएगा। - शेष मणि पांडेय, नगर आयुक्त
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