इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दोषियों के सुधार की संभावना पर विचार किए बिना मृत्युदंड देना उचित नहीं है। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने जमीन विवाद को लेकर दो लोगों की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए दो आरोपियों की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।
कोर्ट ने विवेचना और पुलिस रिकॉर्ड में गंभीर अनियमितताओं पर चिंता जताते हुए डीजीपी उत्तर प्रदेश को जांच कराने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन व न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने बारीक और शाहबाद की ओर से दायर अपील पर दिया है। मुजफ्फरनगर के छप्पर थाने में नवंबर 2011 को हत्या का प्रयास, हत्या व अन्य मामले में एफआईआर याचियों के खिलाफ दर्ज कराई गई थी।
आरोप था कि क्षेत्र के बरला गांव में दो पक्षों के बीच खेत की मेड़ और पेड़ों को लेकर विवाद हुआ। अभियोजन के अनुसार हमले में आजाद उर्फ राजा और रियासत उर्फ मुखिया की मौत हो गई थी, जबकि दो अन्य लोग घायल हुए थे। ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में वर्ष 2017 को आरोपियों को दोषी करार देते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। याचियों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि मामला जघन्य होने के बावजूद इसे दुर्लभतम से दुर्लभतम श्रेणी में रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं। घटना जमीन विवाद से उपजी थी। साथ ही दोषियों के सुधरने की संभावना और अन्य परिस्थितियों पर विचार किए बिना मृत्युदंड दिया गया था। इसलिए मौत की सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती।
कोर्ट ने प्राथमिकी के समय में बदलाव, पंचायतनामा में काट-छांट और हथियारों की बरामदगी में खामियों पर भी गंभीर सवाल उठाए। इसके साथ ही डीजीपी को मुजफ्फरनगर के एसएसपी से समन्वय कर जिले से बाहर के एसपी स्तर के अधिकारी से जांच कराने तथा तीन महीने में कार्रवाई की रिपोर्ट हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।