इलाहाबाद (ब्यूरो)। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शीलाधर संस्थान को बचाने तथा उसकी पुरानी गरिमा बहाल करने के लिए एक बार फिर कवायद शुरू की गई है। डीन साइंस का पद ग्रहण करने के बाद प्रोफेसर एके श्रीवास्तव ने कुलपति को पत्र लिखकर इलाहाबाद विकास प्राधिकरण (एडीए) से जमीन लेने की मांग की है। विश्वविद्यालय के प्लानिंग बोर्ड की सोमवार को होने वाली बैठक में भी यह प्रस्ताव रखा जाएगा।
नोबेल प्राइज के चयन समिति में शामिल रहे रसायन विभाग के प्रोफेसर नील रतन धर ने अपना पूरा वेतन, मकान आदि सभी वस्तुएं विश्वविद्यालय को दान में दे दी थी। मम्फोर्डगंज में अपने आवास में ही उन्हाेंने शीलाधर इंस्टीट्यूट की स्थापना की, जो रसायन विभाग का हिस्सा है। उसमें एग्रीकल्चर रसायन विज्ञान की पढ़ाई तथा शोध होता है। रिसर्च के लिए संस्थान के अंतर्गत सड़क उस पार एडीए से लीज पर जमीन ली गई थी। लीज की अवधि वर्षों पहले समाप्त हो गई है और एडीए अब उस पर काबिज होना चाहता है।
हालांकि प्राफेसर एके श्रीवास्तव समेत अन्य शिक्षकों की पहल पर एडीए लीज की अवधि बढ़ाने के लिए दो-दो बार तैयार हुआ, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन की सुस्ती की वजह से प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। ऐसे में उस जमीन के एडीए के पास जाने की आशंका बन गई हैं।
इस आशंका के बीच रसायन विभाग के प्रोफेसर एके श्रीवास्तव ने डीन का चार्ज संभालने के तत्काल बाद जमीन की लीज बढ़ाने की मांग को लेकर कुलपति को पत्र लिखा है। उन्होंने संस्थान और जमीन की महत्ता बताते हुए उसे बचाने के लिए विश्वविद्यालय की ओर से हर संभव कदम उठाए जाने की मांग की है। उन्होंने कुलपति से मिलकर भी यह मुद्दा उठाया। प्रोफेसर एके श्रीवास्तव का कहना है कि संस्थान का शैक्षणिक महत्व तो है ही, प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर नीलरतन धर से भी उसका संबंध है। इसलिए उस जमीन को बचाने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए।