राज्य वित्त आयोग से मिलने वाली रकम में कटौती के बाद आर्थिक संकट झेल रहे नगर निगम ने ई-टेंडरिंग से रकम बचाने में बड़ी सफलता प्राप्त की है। दस माह में नगर निगम ने इससे तकरीबन 2.50 करोड़ रुपये की बचत की है। तंगी में मिली इस रकम का व्यय कर्मियों के वेतन पर किया जा रहा है, जबकि नगर निगम से कहीं अधिक काम कराने वाले इलाहाबाद विकास प्राधिकरण में अब भी टेंडर की प्रक्रिया मैनुअल है। कई बार तो टेंडर का विवरण भी एडीए की वेबसाइट पर डाउन लोड नहीं किया जाता।
नगर निगम ने पहले विकास कार्य से संबंधित टेंडर मैनुअल होते थे। इसमें निविदा जारी होने से टेंडर पड़ने और उसके खुलने तक हर स्तर पर खेल होता था। मैनुअल टेंडर में सड़क, गली, नाली आदि के निर्माण में रेट भी मनमाने लगाए जाते थे। पूरा खेल सेटिंग का होने के कारण ठेकेदारों से लेकर इससे जुडे़ अफसरंों को इससे फायदा होता था लेकिन व्यवस्था बदली तो जो रकम ठेकेदारों और अफसरों की जेब में जा रही थी, वह नगर निगम के खाते में आने लगी।
नगर आयुक्त देवेंद्र कुमार पांडेय ने ई-टेंडरिंग की व्यवस्था मार्च में लागू की। पहले एक लाख रुपये से ऊपर के कामों के लिए यह व्यवस्था लागू की गई। बाद में हर काम के लिए ई-टेंडर अनिवार्य कर दिया गया। इसका फायदा यह हुआ कि ठेकेदारों में कम्पटीशन बढ़ा। कार्य की दरें नगर निगम के स्टीमेट से भी कम हो गईं। नतीजा हुआ कि मार्च से अब तक नगर निगम ई-टेंडरिंग में दो करोड़ 49 लाख 39 हजार रुपये की बचत कर चुका है।