थैंक्यू मत कहना, मेरी तरह मुसीबत में फंसे तीन लोगों की मदद करना और उनसे भी तीन लोगों की मदद करने को कहना। वह तीन अगले तीन को यही संदेश देंगे और फिर धीरे-धीरे यह भाव देश के करोड़ों लोगों में घर कर जाएगा। कहने को तो यह सलमान खान की एक फिल्म जय हो का डायलाग है, जिसे लाखों लोगों ने सुना और उस पर हाल में तालियां भी पीटीं, पर इस संवाद को अपनी असल जिंदगी में उतार लाए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र आशीष मौर्या। आशीष को मंगलवार को आनंद भवन के सामने एक मोबाइल गिरा पड़ा मिला।
उन्होंने तत्काल मोबाइल मालिक के घर फोन करके घर वालों को इस बारे में इत्तला दी और उन्हें बुलाकर मोबाइल उन्हें सौंप दिया। ऐसा नहीं है कि ईमानदारी की यह कड़ी आशीष से ही शुरू होती है। इस कड़ी की लड़ी में दुर्गेश जैसे लोगों के नाम भी शामिल जिन्होंने इन्हीं परिस्थितियों यही किया जो आशीष ने किया था।
कहने को तो यह एक छोटी सी घटना है, पर हर सकारात्मक चीज की शुरुआत छोटे पैमाने से ही होती है। जैेसे-जैसे यह घटनाएं समाज में प्रचारित होती हैं इनका दायरा अपने आप बढ़ने लगता है। घटना मंगलवार 26 जनवरी की है जब उच्च प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका अपनी स्कूटी से किसी कार्य से बघाड़ा जा रहीं थीं। आनंद भवन के सामने उनके कोट की साइड पॉकेट से मोबाइल सरक कर सड़क पर गिर गया जिसका शिक्षिका को पता भी नहीं चला। यह मोबाइल वहीं से अपने दोस्तों के साथ गुजर रहे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बीए के छात्र बघाड़ा निवासी आशीष के हाथ लग गया। आशीष ने मोबाइल स्विच ऑफ कर जेब में डालने की बजाय उसका डायल्ड नंबर इंडेक्स चेक किया।
डायल किए गए एक नंबर पर जब उसने काल की तो उसकी बात शिक्षिका के पति से हो गई। आशीष ने उन्हें अपनी लोकेशन बताई और आधे घंटे तक उनका वहीं इंतजार किया। उनके पहुंचने पर मोबाइल उनको सौंप दिया। ऐसा नहीं है कि ऐसा करने वाले आशीष अकेले हैं। इसी तरह करछना के पनासा निवासी दुर्गेश पांडेय को भी एक दिन एक महंगा मोबाइल फोन सड़क पर पड़ा मिला। टूट चुके उस मोबाइल को दुर्गेश ने किसी तरह ऑन किया और उसमें मौजूद एक नंबर पर काल करके उसे उसके मालिक को सौंप दिया। यह घटनाएं हुत छोटी हैं मगर हमें बता जातीं हैं ईमानदारी का अपना एक अलग ही आनंद है। उम्मीद है कि आप भी मौका मिलने पर इस आनंद का अनुभव जरूर करना चाहेंगे।