फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दस में बिक रही दो रुपये की सिरिंज

Mon, 27 Feb 2017 01:12 AM IST
मुनेंद्र बाजपेयी, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
विज्ञापन
इंजेक्‍शन - फोटो : डेमो फोटो
विज्ञापन
केंद्र सरकार ने भले ही दिल की सर्जरी में इस्तेमाल किए जाने वाले मेटल स्टेंट और कई जीवन रक्षक दवाओं की कीमत कम कर मरीजों और उनके तीमारदारों को राहत दी है, लेकिन अभी भी देश में दो रुपये की लागत वाली सिरिंज के दस रुपये वसूले जा रहे हैं। निर्माता कंपनियां बड़ा मुनाफा कमा रही हैं। इसी तरह आर्थो सर्जरी गुड्स की मनमानी कीमत पर बिक्री कर मरीजों को लूटा जा रहा है। तमाम शिकायतों और प्रयास के बाद भी सरकार इन सर्जिकल, मेडिकल डिवाइसेज की कीमतों पर अंकुश नहीं लगा पा रही है। स्थानीय स्तर पर इसकी मानीटरिंग भी नहीं की जा रही है।
विज्ञापन


बता दें कि देश में एक सिरिंज बनाने की लागत करीब दो रुपये आती है। इसी कीमत पर बड़े पैमाने पर इसका निर्यात भी किया जाता है, लेकिन अन्य राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी मरीजों को एक सिरिंज के लिए पांच गुना अधिक चुकानी पड़ रही है। आंकड़ों के मुताबिक हर साल करीब तीन अरब सिरिंज की बिक्री से कंपनियां अरबों रुपये का मुनाफा कमा रही हैं। इसकी सीधा असर मरीजों की जेब पर पड़ रहा है। इसी तरह मरीजों को कूल्हा प्रत्यारोपण (हिप इंप्लांट) के लिए नौ हजार की जगह सवा से डेढ़ लाख रुपये देने पड़ रहे हैं। घुटना प्रत्यारोपण में भी मरीजों की जेब कटती है, उनसे 9264 रुपये की जगह 46 से 50,000 रुपये वसूले जाते हैं।

नेशनल फार्मास्यूटिकल्स प्राइजिंग कंट्रोल अथॉरिटी (एनपीपीए) के पास मेडिकल डिवाइसेज तीन गुने या इससे अधिक कीमत पर बेचे जाने की बड़ी संख्या में शिकायतें पहुंची हैं। एपीपीए ने करीब दो साल पहले आर्थो इंप्लांट, सिरिंज और आंखों के लेंस की कीमतों का नियमन (रेगुलेट) किए जाने की बात कही थी, लेकिन अब तक हुआ कुछ नहीं। एनपीपीए ने लंबी कवायद के बाद पखवारे भर पहले दिल की सर्जरी में इस्तेमाल किए जाने वाले स्टेंट की कीमतें तय कर परेशान लोगों को राहत दी है। लोगों को उम्मीद है कि साठ हजार से सवा लाख रुपये में बिकने वाले मेटल स्टेंट की कीमत 7260 रुपये तय हो सकती है तो आर्थो इंप्लांट, आंखों के लेंस और सिरिंज की कीमतें क्यों कम नहीं हो सकतीं।
विज्ञापन


महानगरों की अपेक्षा यहां कू् ल्हा, घुटना प्रत्यारोपण काफी कम है। सरकारी अस्पताल हो या नर्सिंगहोम दुघर्टना में घायल मरीजों की सर्जरी में यदि एक प्लेट भी लगनी है तो उसके तीमारदार उसे चाहकर भी बाहर से खरीदकर नहीं ला सकते। यदि ले भी आए तो उसे बताया जाएगा कि उसकी क्वालिटी खराब है। डॉक्टरों की सहमति के बाद संबंधित आर्थों सर्जिकल गुड्स कंपनी के प्रतिनिधि ही अस्पताल में मुहैया कराएंगे, वो भी मुंहमांगी कीमत पहले जमा करने के बाद।

सर्जिकल गुड्स विक्रेताओं से बातचीत के बाद जो जानकारी मिली वह चौंकाने वाली है। मेडिकल स्टोरों पर सिरिंज छोड़कर आर्थो इंप्लांट उपकरण नहीं मिलते। सर्जिकल गुड्स बेचने वाले लाइसेंसधारी विक्रेता भी इस तरह के सामान मांग न होने के कारण नहीं मंगाते। यदि मरीजों के तीमारदारों ने खुद सामान लाने की बात कही और वह लीडर रोड स्थित दवा की मंडी और मेडिकल स्टोरों पर पर्चा लेकर पहुंचा तो निराश होकर लौटना मजबूरी हो जाती है। कंपनियों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि चिकित्सक सीधे उनके संपर्क में रहें। अस्पतालों में आर्थो सर्जरी होने की दशा में कंपनी के एमआर/प्रतिनिधि डॉक्टरों से मिलकर सर्जरी से पहले संबंधित सामान वहां पहुंचा देते हैं। शहर में तीन-चार लोगों तक सिमटा आर्थों इंप्लांट का यह कारोबार मरीजों से कई गुना वसूली का कारण बन रहा है।

दवा या आर्थो सर्जिकल गुड्स की कीमतें निर्धारित करना सरकार का काम है। टैक्स और ट्रांसपोर्ट के कारण दाम घटते-बढ़ते हैं, लेकिन कोई भी डॉक्टर, नर्सिंगहोम संचालक या दवा विक्रेता एमआरपी से ज्यादा कीमत नहीं लेता। हर मरीज को दवाओं और उपचार में कुछ न कुछ रियायत जरूर दी जाती है। सरकार टैक्स कम कर नीति निर्धारित करे तो मरीजों को राहत मिल सकती है।  - डॉ. आलोक मिश्रा , अध्यक्ष इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें