उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग का अप्रैल 2013 में अध्यक्ष बनाए जाने के बाद डॉ. अनिल यादव ने नियमों की मनमाने तरीके से व्याख्या करके सीधी भर्ती सहित अन्य पदों को भरने का काम किया। इसमें सीधी भर्ती के सात हजार पदों जिसमें डॉक्टर, इंजीनियर और प्रोफेसरों की नियुक्तियां शामिल हैं। इसके साथ 2012 से अब तक हुईं भर्तियों की सीबीआई जांच के दायरे में नौ से अधिक भर्तियां और 25 हजार से अधिक पद होंगे। इनमें सिर्फ पीसीएस के ही करीब तीन हजार और पीसीएस-जे के एक हजार पद शामिल हैं। जांच के आदेश के बाद इन पदों पर चयनित लोगों की सांसे अटक गईं हैं।
आयोग की ओर से 27 मई 2013 को परीक्षाओं में त्रिस्तरीय आरक्षण की व्यवस्था लागू करके पूरी चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने का काम हुआ। त्रिस्तरीय आरक्षण पहली बार पीसीएस 2011 की मुख्य परीक्षा में लागू किया गया। नया नियम लागू होने के बाद घोषित मुख्य परीक्षा के रिजल्ट में 1300 सफल परीक्षार्थियों में सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी मात्र 250 के अंदर सफल हुए। इसके बाद परीक्षार्थी आयोग के निर्णय के विरोध में उतर आए। पहले ही फैसले के विरोध में छात्रों के उतरने के बाद प्रदेश सरकार के हस्तक्षेप के बाद अनिल यादव बैकफुट पर आए।
आरक्षण के मुद्दे पर पीछे हटने के बाद पीसीएस-2011 का रिजल्ट बदलना पड़ा। पीसीएस-जे 2011 प्रारंभिक परीक्षा के एक पेपर में 13 सवाल ऐसे थे जिनके गलत जवाब को आयोग ने सही माना। न्यायालय के आदेश पर रिजल्ट संशोधित करना पड़ा। इसके साथ ही लिखित परीक्षा के जरिए होने वाले चयन में पीसीएस-2012 में ओबीसी के 86 पदों में से 54 पर एक ही जाति के अभ्यर्थियों का चयन होने पर भी सवाल खड़ा हो गया। इसी प्रकार का विवाद पीसीएस 2013, 2014 सहित कई अन्य परीक्षाओं के लिए हुआ।
सीधी भर्ती के पदों में चली आयोग की मनमानी
त्रिस्तरीय आरक्षण नहीं लागू कर पाने की टीस मन में लेकर अनिल यादव ने अपने मात्र ढाई वर्ष के कार्यकाल में सीधी भर्ती के 25 हजार पदों पर चयन प्रक्रिया पूरी कर दी। इनमें से अधिकांश भर्ती को लेकर प्रतियोगी छात्रों ने अपनी आपत्ति दर्ज करवाई। सीधी भर्ती के पदों में डॉक्टरों और इंजीनियरों के साथ ही प्रोफेसरों, स्वास्थ्य विभाग, सचिवालय, पॉलीटेक्निक में सहायक एवं प्रवक्ताओं की भर्ती, राजकीय महाविद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की भर्ती सहित प्रदेश स्तर के कार्यालयों में बड़ी संख्या में नियुक्ति कर दी।
न्यायालय के दखल पर आयोग की मनमानी पर लगी लगाम
कृषि विभाग में तकनीकी सहायक के छह हजार से अधिक पदों पर हुई भर्ती में आरक्षण नियमों की अनदेखी करके रिजल्ट जारी कर दिए गए। इसमें चयन के बाद अभ्यर्थियों ने ज्वाइन भी कर लिया परंतु न्यायालय ने परिणाम को रद्द कर दिया। न्यायालय के आदेश के बाद लोअर सबऑर्डिनेट-2013 प्रारंभिक परीक्षा भी आयोग को एक दिन पहले स्थगित करनी पड़ी थी। लोअर सबऑर्डिनेट के पदों पर 2009 के बाद भर्ती हो रही थी। इसके बाद तो परीक्षा दर परीक्षा आयोग की मनमानी बढ़ती गई, और प्रतियोगी छात्रों का आंदोलन तेज होता गया।
इसी बीच अक्तूबर 2015 में डॉ. अनिल यादव को अध्यक्ष पद पर गलत चयन को देखते हुए हाईकोर्ट ने उनकी नियुक्ति रद कर दी। आयोग से अनिल यादव के जाने के बाद भी यहां से होने वाली सभी भर्तियां लगातार विवादों में रही और विधान सभा चुनाव के दौरान तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयोग की कार्यशैली को लेकर गंभीर टिप्पणी की थी। प्रदेश में नई सरकार बनने के बाद सभी भर्ती आयोगों में नियुक्ति प्रक्रिया ठप है।
आयोग में सामान्य वर्ग के पदों पर ओबीसी में से एक जाति विशेष के लोगों की भर्ती का खेल लंबे समय से चल रहा था। जेई सिविल 2011 के 542 पदों की सीधी भर्ती में जनरल के 415, एससी/एसटी के 127 पदों पर आरक्षण था। 2013 में जब रिजल्ट आया तो ओबीसी का एक भी पद नहीं होने के बाद 313 ओबीसी स्टूडेंट इसमें सफल घोषित किए गए, इस भर्ती में सामान्य वर्ग के 102 अभ्यर्थी ही सफल घोषित किए गए। सिविल इंजीनियरिंग के लेक्चरर के तीन पदों के लिए 28 अक्टूबर 2013 को हुए इंटरव्यू में एक जाति विशेष का एक अभ्यर्थी, दो एससी सफल हुए, सामान्य वर्ग का कोई नहीं सफल हुआ।