उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की भर्तियों की सीबीआई जांच की घोषणा के बाद प्रतियोगियों और छात्रों का बड़ा हुजूम बुधवार को एक बार फिर सड़कों पर दिखा। इस बार वे आंदोलन के लिए एकत्रित नहीं थे, बल्कि जश्न मनाने का मौका था। आंखों में उम्मीदों की चमक और उनके जश्न में इस बात का संकल्प भी साफ निहित था कि युवाओं के सपनों को कुचलने वालों को जब तक जेल नहीं हो जाती तब तक उनका संघर्ष पूरा नहीं होगा और लड़ाई जारी रहेगी। युवाओं की आंखों में बिखरी इस चमक और संकल्प के नायक बने प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के मीडिया प्रभारी अवनीश पांडेय तथा अन्य प्रतियोगी साथी।
अवनीश के जज्बे और जुनून ने लाखों युवाओं के सपनों को एक बार फिर उम्मीदें दी हैं। लोक सेवा आयोग की गरिमा के विपरीत आचरण करने वाले अनिल यादव को न्यायालय के आदेश पर दो साल पहले हटाए जाने और अब भर्तियों की सीबीआई जांच की घोषणा के बाद प्रतियोगियों के सपनाें को फिर से पंख लग गए हैं। यह लड़ाई इतनी आसान नहीं थी लेकिन अधिवक्ताओं के मार्गदर्शन में अवनीश पांडेय, अयोध्या सिंह आदि प्रतियोगियों के जज्बे एवं संघर्षों ने इस अभियान को वहां तक पहुंचा दिया है जहां अब आने वाली सरकारें भी दोबारा किसी अनिल यादव को लोक सेवा आयोग जैसी संस्था का अध्यक्ष नहीं बना पाएंगी और न ही कोई दूसरा अध्यक्ष युवाओं के सपनों से इस कदर मजाक करेगा।
हालांकि अयोध्या का आबकारी निरीक्षक के पद चयन के बाद प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अस्तित्व के साथ संघर्षों के भविष्य पर भी सवाल खड़ा हो गया था लेकिन अवनीश ने हिम्मत नहीं हारी। सड़क और न्यायालय में शुरू इस लड़ाई में प्रतियोगियों की नई जमात तथा अधिवक्ताओं का पैनल उनके साथ खड़ा दिखा। कई अफसर और बुद्धजीवियों ने भी सीधी भागीदारी निभाकर लड़ाई को नया आयाम दिया। जैसी आशंका थी उसी के अनुरूप अवनीश को लालच के साथ धमकियां भी मिलीं। संघर्षों के दौरान अपने ही बीच के लोगों ने आरोप भी लगाए लेकिन वह मकसद से नहीं डिगे।
इस लड़ाई की शुरुआत 10 जुलाई 2013 को पीसीएस-2011 मुख्य परीक्षा के परिणाम के बाद हुई। अवनीश कहते हैं, ‘रिजल्ट आने के पश्चात यह सोचने पर विवश होना पड़ा कि आखिर सेलेक्शन क्यों नहीं हुआ। जब अपनी तैयारी में खामी नहीं मिली तो आयोग की कार्यप्रणाली पर ध्यान दिया गया। इसमें स्पष्ट हो गया कि स्केलिंग की आड़ लेकर अनिल यादव ने चहेतों को नियुक्त कर दिया है।’ हजारों प्रतियोगी निराशा में थे। ऐसे में एक निर्णायक लड़ाई जरूरी थी। इस लड़ाई में कई बार हार मिली, जिसके बाद तमाम तरह के आरोप लगे। इससे आहत जरूर हुआ लेकिन जज्बा और मजबूत हुआ। अनिल यादव को हटाया जाना बड़ी जीत थी लेकिन सीबीआई जांच की मांग अब पूरी होने जा रही है। यह युवाओं के लिए उम्मीदों वाला दिन है लेकिन दोषियों का जेल में जाना तथा आयोग की भर्तियों में पारदर्शी व्यवस्था को लागू करने का संघर्ष अभी बाकी है।