घर वापसी करने वालों के लिए शरणागत, भागवत और धर्मपूत जातियां बनेंगी। 12 साल के परीक्षण के लिए उन्हें भागवत, शरणागत और धर्मपूत जातियां निर्मित करके रखा जाएगा। इतने दिनों सामान्य हिंदू धर्म का पालन करने पर उन्हें उनकी मूल जाति में मिल जाने की व्यवस्था दी जा सकती है।
ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि दूसरे धर्म से सनातन धर्म में वापसी करने वालों के लिए तीन अलग-अलग जातियां बनाई जाएंगी। जो लोग भय, लोभ और बहकावे के कारण सनातन धर्म छोड़कर कहीं और गए थे, उन्हें अब यह अनुभव हो रहा है कि उनकी या उनके पूर्वजों की यह भूल थी।
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उन्हें अपनी भूल सुधारते हुए अपने धर्म में वापस आने का अवसर अवश्य मिलना चाहिए। शनिवार को सेक्टर 19 स्थित शिविर में आयोजित परमधर्म संसद में शंकराचार्य ने कहा कि घर वापसी के बाद यह प्रश्न उठता है कि वह किस जाति या वर्ण के माने जाएंगे।
परमधर्म संसद 1008 यह व्यवस्था देती है कि उन्हें शरणागत मानकर हम उन्हें स्वीकार करेंगे। कम से कम 12 साल के परीक्षण के लिए उन्हें भागवत, शरणागत और धर्मपूत जातियां निर्मित करके रखा जाएगा।
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इतने दिनों सामान्य हिंदू धर्म का पालन करने पर उन्हें उनकी मूल जाति में मिल जाने की व्यवस्था दी जा सकती है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि धर्म शब्द से संबोधित होने वाला मात्र एक ही धर्म है और वह है सनातन, वैदिक, हिंदू, आर्य या परम धर्म।
'धर्मांतरण के लिए तो एक धर्म से दूसरे धर्म में जाना जरूरी होता'
आजकल कुछ मत-पंथों को भी धर्म नाम से पहचान दे दी गई है, जो अनुचित है। धर्म एक ही है, दूसरा है ही नहीं तो फिर धर्मांतरण शब्द बन ही नहीं सकता, क्योंकि धर्मांतरण के लिए तो एक धर्म से दूसरे धर्म में जाना जरूरी होता है।
आज पूरे विश्व में यूं तो कुल 43 सौ धर्म बताए जाते हैं पर उसमें हिंदू, ईसाई, इस्लाम, बौद्ध, जैन, सिख, यहूदी, बहाई, ताओ, शिंटो प्रमुख हैं। पर मूल रूप से ये सभी धर्म नहीं कहे गए हैं। जैसे यहूदी व ईसाइयत ने स्वयं को रिलीजन, इस्लाम ने स्वयं को मजहब के रूप में पुकारा है। जब वे स्वयं ही स्वयं को धर्म कहकर नहीं पुकारते तो फिर हम उन्हें धर्म कहकर कैसे पुकार सकते हैं?
शंकराचार्य ने परमधर्मसंसद में परमधर्मादेश के जरिये यह आदेश जारी किया कि धर्म शब्द से केवल सनातन और सनातन से निकले भारतीय मूल की शाखाओं जैन, बौद्ध, सिख आदि को ही पुकारा जाए। अन्य को विशेषकर अब्राहमिक मतों को उनके मूल नाम रिलीजन, मजहब आदि से पहचाना और पुकारा जाए।
ईसाइयत को मानने वालों को धार्मिक नहीं रिलीजियस कहा जाए और इस्लाम को मानने वालों को भी धार्मिक या मुस्लिम धर्म मानने वाला नहीं बल्कि मजहबी या मुसलमान कहा जाए। ऐसा कहने के पीछे किसी का अपमान करना नहीं अपितु अपनी पहचान को साफ करना और घालमेल से पहचाने जाने से इन्कार करना है।
हिंदू और हिंदू भूमि भारत से उपजे मतों को ही धर्म नाम से और उनके अनुयायियों को धार्मिक कहकर संबोधित करना न्याय है। विषय स्थापना साध्वी पूर्णांबा ने की। ईसाई प्रतिनिधि के रूप में वाराणसी के मैत्री भवन के फादर यान उपस्थित थे। धर्माधीश के रूप में देवेंद्र पांडेय ने संसद का संचालन किया।