मसलन, घर में लगे बल्ब, माचिस की तीलियों आदि के प्रयोग से विज्ञान के उन मूलभूत सिद्धांतों को समझाने का प्रयास किया जाता है, जिसके लिए विद्यार्थियों को स्कूल की प्रयोगशाला में उपकरणों की जरूरत पड़ती है। नासी में ट्रेनिंग के बाद विद्यार्थियों को देश की जानी मानी प्रयोगशालाओं में ले जाया जाता है। पिछली बार विद्यार्थियों को उत्तराखंड स्थित आर्य भट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ले जाया गया गया था, जहां एशिया की सबसे बड़ी टेलीस्कोप है। विद्यार्थियों को टेलीस्कोप से देखने का मौका भी मिला था।
नासी के सहायक अधिशासी सचिव डॉ. संतोष शुक्ला बताते हैं कि इस बार जाड़े की छूट्टियों में विंटर स्कूल शुरू करने की तैयारी है। विद्यार्थियों को कानपुर ले जाने का कार्यक्रम प्रस्तावित है। हालांकि, इसे अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है। समर-विंटर स्कूल का उद्देश्य विद्यार्थियों में विज्ञान के प्रति अभिरुचि जगाना है। इसमें सफलता भी मिली है। देखा गया है कि इसमें शामिल होने वाले 80 फीसदी विद्यार्थी आगे चलकर उच्च शिक्षा में भी विज्ञान के क्षेत्र से ही जुड़ते हैं।
एक स्कूल से चार विद्यार्थी हो सकते हैं शामिल
समर और विंटर स्कूल में एक विद्यालय से अधिकतम चार विद्यार्थी ही शामिल हो सकते हैं, जिनमें दो विद्यार्थी भौतिकी और दो बायो से जुड़े होते हैं। इस तरह यूपी, एमपी और बिहार के 50 स्कूलों से 200 विद्यार्थी इसमें भागीदारी करते हैं। प्रत्येक स्कूल से एक शिक्षक भी इसमें भागीदारी करते हैं, जिन्हें अलग से ट्रेनिंग दी जाती है। प्रतिभाग करने वाले विद्यार्थियों और उनके शिक्षकों के लिए रहने, खाने-पीने की व्यवस्था नासी की ओर से नि:शुल्क की जाती है।
भौतिकी और बायो के क्षेत्र में मिलते हैं पदक
समर और विंटर स्कूल के दौरान विद्यार्थियों की छोटी-छोटी परीक्षाएं ली जाती हैं, उनसे एसाइनमेंट बनवाए जाते हैं और इसी आधार पर उन्हें पदक प्रदान किए जाते हैं। विंटर स्कूल में भौतिकी के लिए प्रो. एचसी खरे स्मृति स्वर्ण पदक एवं बायोलॉजी के लिए प्रो. यूएल श्रीवास्तव स्मृति स्वर्ण पदक और समर स्कूल में भौतिकी के लिए प्रो. कृष्णाजी स्मृति गोल्ड मेडल और बायोलॉजी के लिए प्रो. वीपी शर्मा स्मृति गोल्ड मेडल दिए जाते हैं। इसके अलावा द्वितीय एवं तृतीय स्थान के लिए भी अवार्ड दिए जाते हैं और 10 विद्यार्थियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहन पुरस्कार मिलते हैं।
देश की सबसे पुरानी अकादमी
नासी देश की सबसे पुरानी अकादमी है। विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए इसकी स्थापना वर्ष 1930 में प्रो. मेघनाद साहा ने की थी। इसका उद्देश्य विज्ञान को समाज तक पहुंचाना है। वर्तमान में देश-विदेश के तकरीबन तीन हजार वैज्ञानिक नासी के फेलो और सदस्य के रूप में पंजीकृत हैं।