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Prayagraj : पति-पत्नी की तरह साथ रहना साबित हो तो विवाह का कठोर प्रमाण जरूरी नहीं

Sat, 11 Jul 2026 07:58 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों और उनका वैवाहिक संबंध अन्य साक्ष्यों से स्थापित होता हो, तो केवल वैध विवाह का कठोर दस्तावेजी प्रमाण न होने के आधार पर महिला को भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
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अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों और उनका वैवाहिक संबंध अन्य साक्ष्यों से स्थापित होता हो, तो केवल वैध विवाह का कठोर दस्तावेजी प्रमाण न होने के आधार पर महिला को भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने महिला के भरण-पोषण संबंधी दावा खारिज करने का आदेश निरस्त करते हुए मामला दोबारा परिवार न्यायालय को भेज दिया। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अचल सचदेव की एकलपीठ ने महाराजगंज निवासी महिला की याचिका पर दिया।

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महिला ने सीआरपीसी धारा 125 के तहत महाराजगंज के परिवार न्यायालय में दायर याचिका में कहा था कि 2017 में दोनों ने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था। इसके बाद पति और ससुराल वालों ने चार पहिया वाहन की मांग को लेकर दहेज उत्पीड़न किया। मारपीट की और नाबालिग बेटे सहित घर से निकाल दिया। उसने अपने लिए 25 हजार रुपये और बेटे के लिए 15 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग की थी।

परिवार न्यायालय ने यह कहते हुए महिला का दावा खारिज कर दिया था कि उसने केवल विवाह अधिकारी के समक्ष दिए गए नोटिस की फोटोप्रति दाखिल की है। वैध विवाह का कोई दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। हालांकि, अदालत ने बच्चे को भरण-पोषण के लिए पांच हजार रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया था।
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कोर्ट ने कहा कि पति ने स्वयं स्वीकार किया था कि दोनों साथ रहे। सरकारी आवास में एक साथ निवास किया और उनके संबंध से बेटे का जन्म हुआ। इसके बावजूद परिवार न्यायालय ने इन महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी करते हुए यांत्रिक ढंग से आदेश पारित किया।

कोर्ट ने नाबालिग बेटे को पांच हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश बरकरार रखते हुए कहा कि भरण-पोषण के मामलों में तकनीकी और संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने के बजाय सामाजिक न्याय और कानून के उद्देश्य को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाना चाहिए। कोर्ट ने महिला के भरण-पोषण संबंधी दावा खारिज करने का आदेश निरस्त करते हुए मामला दोबारा परिवार न्यायालय को भेज दिया। साथ ही निर्देश दिया कि दोनों पक्ष रजनीश मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार अपनी आय और संपत्ति का शपथपत्र दाखिल करें। साथ ही परिवार न्यायालय तीन माह के भीतर मामले का शीघ्र निस्तारण करे।

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