अपीलकर्ता के घर में लूट या डकैती के संबंध में कोई साक्ष्य नहीं मिला है। जब शिकायतकर्ता वापस लौटा तो अपीलकर्ता अपने घर में नहीं मिला और उसने सबसे पहले अपने पति का शव देखा। आरोपी सीआरपीसी की धारा 313 के तहत अपने बयान को साबित करने में भी विफल रहा कि वह इस हद तक विकलांग था कि वह हथौड़े का उपयोग नहीं कर सकता था लेकिन उसके सहायक गवाह ने इस बात की पुष्टि नहीं की। लिहाजा, अपीलकर्ता दोषी है।
मामले में मेरठ की सत्र अदालत ने अपीलकर्ता को अपने पिता की मौत का दोषी पाते हुए आजीवन कारावास तथा 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अपीलकर्ता ने सत्र न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी। उसकेखिलाफ मेरठ के कोतवाली थाने में पिता की हत्या करने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।