प्लेटिनम की किल्लत के कारण कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन जैसी महत्वपूर्ण दवाओं की उपलब्धता कम हो गई है। इससे चिकित्सकों और कैंसर रोगियों के लिए उचित विकल्प खोजना मुश्किल हो गया है।
स्वरुप रानी नेहरू चिकित्सालय और कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल में हर महीने हजारों कैंसर रोगियों की कीमोथेरेपी की जाती है। वर्तमान हालात में उन्हें दवाइयां मिलने में कठिनाई हो रही है।
इस्राइल-अमेरिका के बीच चल रहे तनाव के कारण देश में दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हुई है। प्रयागराज में भी प्लेटिनम आधारित दवाओं की उपलब्धता चिंता का विषय बनी हुई है।
इन दवाओं का उपयोग फेफड़े, सिर और गर्दन के कैंसर में होता है। यह सर्वाइकल, ओवरी और टेस्टिकुलर कैंसर सहित कई अन्य प्रकार के कैंसर के इलाज में भी सहायक हैं। इनका कोई अन्य विकल्प फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन पहले सस्ती थीं, जिससे आम लोगों को भी लाभ मिलता था। अब दाम बढ़ने से आम इंसान के लिए कीमोथेरेपी का विकल्प खोजना मुश्किल हो गया है।
इनसेट
दवाओं की कमी का मुख्य कारण
दवाओं की कमी का सबसे बड़ा कारण प्लेटिनम की बढ़ती कीमतें हैं। प्लेटिनम वह मुख्य कच्चा माल है जिससे इन दवाओं का निर्माण होता है। पिछले कुछ वर्षों में प्लेटिनम की कीमतों में 225 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। बीते छह महीनों में ही इसकी कीमत लगभग दोगुनी हो चुकी है।
वर्जन
दवाओं की कमी से कीमोथेरेपी की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। इससे कैंसर के दोबारा लौटने का खतरा बढ़ जाता है। मरीजों की रिकवरी और जीवित रहने की संभावना पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है। डॉ. मानस दुबे, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल।