इतिहास गवाह है कि धर्म की रक्षा के लिए किन्नरों के कंधे पर रखकर धर्मयुद्ध लड़े गए। सो हमारी जो अपनी असली जगह है, हम वहीं लौटे हैं। किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने कहा है कि किन्नर अखाडे़ की स्थापना का उद्देश्य अखाड़ा परिषद या किसी अखाड़े के महत्व को कम करना नहीं बल्कि किन्नर समाज को उसके मूल घर से परिचित कराना है।
अलोपीबाग स्थित शंकराचार्य आश्रम में आयोजित अखाड़े के तीसरे स्थापना दिवस पर ‘अमर उजाला’ से मुलाकात में उन्होंने कहा, किन्नर तो परमात्मा का स्वरूप हैं, उन्हें परमात्मा को पाने के लिए संन्यास लेने या अन्य कोई जतन करने की जरूरत नहीं है। भगवान शिव ने स्वयं अर्धनारीश्वर का रूप धरा था। हमें कोई मान्यता और सम्मान दे या न दे। हम किसी का तिरस्कार नहीं करते सिर्फ प्यार बांटते हैं। जहां तक तिरस्कार की बात है तो हमसे ज्यादा इस शब्द से भला कौन परिचित है। बचपन से लेकर बड़े होने तक और परिवार से लेकर समाज तक हमें सिर्फ और सिर्फ तिरस्कार ही मिला। हम तो प्रेम, सम्मान और आदरपूर्वक सभी को अपने कार्यक्रमों में निमंत्रित करते हैं। अब यह उनका विवेक है कि वह आएं या न आएं। जिन्हें हम दुआ देते हैं, उनसे क्या मांगेंगे, उनका क्या छीनेंगे। बस, हमें हमारी जगह दे दो। किन्नर अखाडे़ में बिना भेदभाव सभी का स्वागत है। फिलहाल, अर्द्धकुंभ मेले की तैयारी है। हम अपना शिविर लगाएंगे और अनेक धार्मिक-सांस्कृतिक अनुष्ठान करेंगे।
किन्नर अखाड़े में शुक्रवार को सात और नए सदस्य शामिल हुए। अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने परंपरा के तहत वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उन्हें श्री विद्या की दीक्षा दी। इनमें से भुवनेश्वर की मीरा परेडा, मुंबई की फाल्गुनी मेहता और नई दिल्ली की भवानी सहित तीन को महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई।
सभी नए सदस्यों को स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने गुरुमंत्र दिया। अखाड़े के तीसरे स्थापना दिवस पर अलोपीबाग स्थित शंकराचार्य आश्रम में हुए समारोह में दीक्षा के बाद सभी सदस्यों ने निष्ठापूर्वक अखाड़े की परंपरा का निर्वाह करने की शपथ ली। इस तरह पवित्रा जी सहित अखाड़े में महामंडलेश्वरों की संख्या चार हुई।
दूसरे चरण में धार्मिक-सांस्कृतिक अनुष्ठान के तहत मुंबई से आए विर्श्नोई एवं ग्रुप ने शिवतांडव प्रस्तुत कर समां बांधा। मुंबई के पहले लावणी किन्नर ग्रुप के कलाकारों ने भी नृत्य प्रस्तुत किया। नृत्य संरचना का निर्देशन पद्मावती एवं मंगेश ने किया।
इसी क्रम में कर्नाटक-महाराष्ट्र् के जोगती देवीभक्त किन्नरों ने रेणुका-यलम्मा यानी पार्वती की स्तुति की जिसमें उन्होंने सिर पर देवीप्रतिमा रखकर नृत्य करते हुए आनंदित किया। कार्यक्रम में स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती सहित स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती के अतिरिक्त महामंडलेश्वर पवित्रा, पार्वता माई, संजना माई, लक्ष्मी सिंंह मयूरी, कामिनी सहित अनेक संत-महात्मा, तीर्थपुरोहित मौजूद थे।
तीसरे स्थापना दिवस पर दीक्षा लेने वालों में भुवनेश्वर की मीरा परेडा, श्वेता पारिख, धुले-महाराष्ट्र की पार्वता माई, मुंबई की फाल्गुनी मेहता, नई दिल्ली की भवानी, नवी मुंबई की बाडू भाऊ, चालीस गांव की पूनम शामिल हैं।