इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने शंकरगढ़ के 46 गांवों में सिलिका सैंड के खनन पर रोक लगाते हुए रानी शंकरगढ़ के पक्ष में निचली अदालत के स्थगन आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने 27 अप्रैल 1959 को निष्पादित खनन पट्टों को अवैध करार दिया है। प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह 1959 से अब तक किए गए खनन की रॉयल्टी नौ प्रतिशत ब्याज के साथ रानी शंकर गढ़ राजेंद्री कुमार से वसूल सकता है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि रद्द किए गए खनन पट्टों का नए सिरे से नियमानुसार निष्पादन होने तक उस पर किसी प्रकार का खनन नहीं होने दिया जाए।
उत्तर प्रदेश सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति शशिकांत की पीठ ने लघु वाद न्यायालय इलाहाबाद के 20 जुलाई 1979 के आदेश को रद्द कर दिया है। अवर न्यायालय ने प्रदेश सरकार को इन 46 गांवों में शंकरगढ़ स्टेट के पट्टों पर हस्तक्षेप करने से रोक दिया था। अवर न्यायालय ने एक जनवरी 1952 से 31 मई 1958 तक के बीच नौ लाख 40 हजार 235 रुपये रॉयल्टी लेने के आदेश दिया था जिसे हाईकोर्ट ने रद्द करते हुए 1958 से रॉयल्टी वसूलने का आदेश दिया है। प्रदेश सरकार की अपील पर अपर महाधिवक्ता अशोक पांडेय, आरसी यादव और डा. वाईके श्रीवास्तव ने पक्ष रखा।
चार हजार सालाना रॉयल्टी पर मिला था पट्टा
रानी शंकरगढ़ राजेंद्री कुमारी के पक्ष में प्रदेश सरकार ने 27 अप्रैल 1959 को 46 गांवों के पट्टे का आवंटन मात्र चार हजार रुपये सालाना की रॉयल्टी पर किया था। इसमें उनको पत्थर, बोल्डर, मोरंग और सिलिका सैंड के खनन का पूरा अधिकार दिया गया था। 17 फरवरी 1966 को राज्य सरकार ने नोटिस जारी करते हुए कहा कि आवंटित पट्टे पर शर्तों के विपरीत अत्याधिक खनन किया जा रहा है। यह खनन नियमावली के भी विपरीत है। खनन के एवज में 75 पैसे प्रति टन की दर से रॉयल्टी जमा करने का भी नोटिस में आदेश दिया गया। यह चेतावनी दी गई कि ऐसा नहीं करने पर पट्टा रद्द कर दिया जाएगा। इस नोटिस पर अवर न्यायालय ने रोक लगाते हुए प्रदेश सरकार को 46 गांवों के पट्टे पर हस्तक्षेप करने से रोक दिया था।