फुल बेंच के सामने तीन सवाल थे। एक तो क्या नेशनल हाईवे एक्ट 1856 (3-डी) की अधिसूचना के प्रकाशन के बाद मूलखातेदार या काश्तकार केवल मुआवजा पाने का हकदार है। दूसरा, नेशनल हाईवे एक्ट 3 (जी) के तहत एक बार भूमि के मुआवजे का निर्धारण हो गया है तो अगर भूमि का विक्रय हो जाता है तो दूसरा खरीदार पूर्व मालिक से क्षतिपूर्ति नियमानुसार ले सकता है। तीसरा, इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो जजों की खंडपीठ ने सुरेंद्र नाथ सिंह केस में दी गई व्यवस्था को सही माना है।
मामले में गाजीपुर में नेशनल हाईवे ने भूमि अधिग्रहीत कर इसकी अधिसूचना प्रकाशित की थी। इसके बावजूद एक महिला ने नेशनल हाईवे की ओर से अधिग्रहीत की गई भूमि का विक्रय कर दिया था। रेवेन्यू रिकॉड में उसका नाम दर्ज हो गया, जिसे लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई।
कोर्ट ने मामले में सुरेंद्र नाथ सिंह के केस में खंडपीठ के फैसले को सही मानते हुए कहा कि दूसरा हकदार मुख्य काश्तकार (विक्रयकर्ता) की सहमति के बाद केवल मुआवजा पाने का हकदार होगा। वह किसी अन्य प्रकार के लाभ का दावा नहीं कर सकता है। साथ ही अधिसूचना को भी चुनौती नहीं दे सकता है।