प्रयागराज। नर्सरी और प्ले स्कूलों में स्पेशल बच्चों के प्रवेश की राह बहुत मुश्किल है। स्पेशल बच्चों को घर के पास के स्कूलों में प्रवेश के लिए अभिभावक यहां से वहां दौड़ लगा रहे हैं। शहर के अधिकांश स्कूलों में स्पेशल बच्चों के प्रवेश के लिए पढ़ने के लिए कोई इंतजाम नहीं है। स्कूल वाले स्पेशल बच्चों के अभिभावकों से प्रवेश देने से बच रहे हैं। अभिभावक जब स्कूल वालों से प्रवेश के लिए बात करते हैं तो वह बच्चे हालत देखकर उन्हें प्रवेश न देकर सुविधा नहीं होने की बात कहकर मना कर देते हैं। इन स्कूलों में नियमानुसार स्पेशल बच्चों केलिए शिक्षक नियुक्ति होनी चाहिए, परंतु अधिकांश स्कूलों में स्पेशल बच्चों के लिए शिक्षक नहीं हैं।
शहर के स्कूलों में स्पेशल बच्चों के लिए नहीं हैं सुविधाएं
स्पेशल बच्चों के लिए काम करने वाले त्रिशला फाउंडेशन के डॉ. जितेंद्र जैन का कहना है कि गिनती के स्कूल ही दिव्यांग बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन दे पाते हैं। इसमें अधिकांश स्कूलों में इन बच्चों केलिए सुविधाएं नहीं हैं, इसी आधार पर यह स्कूल ऐसे बच्चों को प्रवेश देने से बचते हैं। सरकार और कोर्ट की ओर से इस बारे में समय-समय पर कहा जाता रहा है कि जिन स्कूलों में डिसएबिलिटी वाले बच्चों के लिए इंतजाम नहीं है, उनकी मान्यता वापस ले ली जाए। शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत प्राइवेट स्कूलों में ईडब्ल्यूएस में कुल सीटों का 25 फीसदी रिजर्व होंगी। आरटीई में चिल्ड्रेन विद डिसएबिलिटी के लिए सीटें रखना जरूरी है। स्कूल वाले जिस प्रकार से गरीब बच्चों को प्रवेश देने में आनाकानी करते हैं, ठीक उसी प्रकार से स्पेशल बच्चों को प्रवेश देने से स्कूल वाले बच रहे हैं।
स्कूल वाले नहीं देते खाली सीटों का विवरण
दिव्यांगों के लिए काम करने वाले सोशल एक्टिविस्ट श्रीनारायण कहते हैं कि स्कूल वाले प्रवेश के गलत आंकड़े पेश करते हैं, स्कूल वाले यह कहकर बचने की कोशिश कर रहे हैं कि बच्चे आते ही नहीं। शहर के अधिकांश स्कूलों में फीस सहित अन्य सुविधाएं ऑनलाइन होने के बाद भी बच्चों के प्रवेश के लिए ऑनलाइन आंकड़े नहीं मिलते। अभिभावक को पड़ोस के स्कूल के बारे नहीं जानते की वहां प्रवेश के लिए कितनी सीटें उपलब्ध हैं। हाईकोर्ट ने भी 2012 के आदेश में सभी स्कूलों में हर तरह के दिव्यांग बच्चों के लिए सुविधा उपलब्ध कराने का आदेश दिया था।
केस-1: सेरेब्रल पाल्सी से ग्रसित अल्लापुर की प्रगति सिंह (10 वर्ष ) के पिता पवन कुमार का कहना है कि सरकारी स्कूलों में तो इस प्रकार के बच्चों के लिए सुविधाओं का अभाव है, निजी स्कूल स्पेशल बच्चों की परेशानी से बचने के लिए उन्हें प्रवेश देने से आनाकानी करते हैं। पवन मूल निवासी जौनपुर के परंतु बच्ची के इलाज और शिक्षा के लिए अल्लापुर में किराए का मकान लेकर रहते हैं, वह भदोही में शिक्षक हैं। उनका कहना है कि अल्लापुर में एक नामी स्कूल में वह दो वर्ष से प्रवेश के लिए चक्कर लगा रहे हैं। स्कूल वालों को बच्ची की देखभाल के लिए अतिरिक्त फीस देने के लिए भी तैयार हैं, इसके बाद भी प्रवेश नहीं दिया।
केस-2: गोरखपुर के संतोष गुप्ता अपने सेरेब्रल पाल्सी ग्रसित बेटे पवन गुप्ता के इलाज के लिए इलाहाबाद आए हैं। अल्लापुर में पत्नी अर्चना और बेटी पलक के साथ किराए का मकान लेकर बच्चे का इलाज करवा रहे हैं, इलाज के साथ अल्लापुर और जार्ज टाउन स्थित स्कूल में बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाने का प्रयास कर चुके हैं, हर बार स्कूल वाले बहाना बनाकर प्रवेश देने से मना कर देते हैं। इनके लिए बच्चे का इलाज और उसकी शिक्षा ही जीवन का उद्देश्य बन चुका है। इसी प्रकार की शिकायत शहर के त्रिशला फाउंडेशन में इलाज करवा रहे बच्चों यश मिश्र, आदित्य शुक्ल, स्नेहा, गौरव के अभिभावकों का है।
‘‘दिव्यांग और स्पेशल बच्चों को प्रवेश देने से कोई स्कूल मना नहीं कर सकता। यूपी बोर्ड, सीबीएसई और सीआईएससीई से जुड़े कोई भी स्कूल इस आधार पर किसी बच्चे को प्रवेश देने से मना नहीं कर सकते कि वह शारीरिक तौर अक्षम है। जो विद्यालय प्रवेश नहीं देंगे, उनके खिलाफ आरटीई के नियमों के तहत कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि इन बच्चों को माध्यमिक शिक्षा में अलग से आरक्षण का कोई नियम नहीं है।’’
आरएन विश्वकर्मा
जिला विद्यालय निरीक्षक, प्रयागराज