जातिसूचक शब्दों का नहीं मिला रिकॉर्ड
हाईकोर्ट ने एफआईआर और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर जातिसूचक शब्द कहे या जानबूझकर अपमानित किया। कोर्ट ने यह भी पाया कि अभियोजन यह प्रदर्शित नहीं कर सका कि कथित अपमान सार्वजनिक रूप से हुआ था और आरोपी का उद्देश्य पीड़ित को अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य होने के कारण अपमानित करना था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पीड़ित के एससी/एसटी समुदाय से संबंधित होने के आधार पर एससी-एसटी एक्ट की धाराएं नहीं लगाई जा सकतीं। अपराध के आवश्यक तत्वों का आरोप और प्रथमदृष्टया समर्थन करने वाली सामग्री रिकॉर्ड पर होना जरूरी है। हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एससी-एसटी एक्ट के तहत जारी समन/संज्ञान आदेश रद्द कर दिया। वहीं धोखाधड़ी, आपराधिक न्यासभंग, आपराधिक षड्यंत्र, गाली-गलौज और धमकी से जुड़े आरोपों में ट्रायल जारी रखने का आदेश दिया।