वर्ष 1880-81 में अयोध्या से आए साधु सुदर्शनदास ने इस कूप को पूरा साफ कराया था। उन्होंने ही कुएं के पास मंदिर बनवाया। पुरातात्विक दृष्टि से कहा जाता है कि समुद्रगुप्त ने अपने शासनकाल में इस कुएं का निर्माण कराया था। जिस टीले पर यह कूप स्थित है, उसके पास गंगा की ओर जाने पर प्राचीन गुफाओं के अवशेष भी मिलते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि कभी समुद्र कूप के पास बस्ती भी आबाद रही होगी। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण के पूर्वज पुरवा की राजधानी इसी क्षेत्र में थी।
सृष्टि का पहला यज्ञ और समुद्र कूप
मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि का पहला यज्ञ प्रयाग में किया था। इसमें देवी-देवताओं, समुद्र, नदियों व अन्य जल स्रोतों को आमंत्रित किया था। यज्ञ समाप्त होने पर वापस जाते समुद्र और नदियों से ब्रह्मा जी ने अपना-अपना अंश प्रयाग में छोड़ने का आह्वान किया। उनके कहने पर समुद्र, नदियों व अन्य जलस्रोतों ने अपने-अपने अंश छोड़े भी। जिस जगह समग्र जल एकत्र हुआ, उस स्थान पर यह कुआं बना। इसीलिए मान्यता है कि समुद्र कूप में सभी पवित्र जल स्रोतों के अंश समाहित हैं। झूंसी के ऐतिहासिक उल्टा किला और उसके साथ समुद्र कूप के जीर्णोद्धार की जब तैयारी हो रही है, तब इस अद्भुत कुएं के पर्यटन मानचित्र पर आने की उम्मीद भी जग गई है।