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राजपरिवारों ने भी कहा, न हो इतिहास से छेड़छाड़

Thu, 16 Nov 2017 01:19 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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PADMAWATI_RAJPUTSENA
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रिलीज के पहले ही संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती जबर्दस्त विवादों में घिर गई है। एक ओर जहां संजय सहित फिल्म में पद्मावती का किरदार निभा रहीं दीपिका पादुकोण दावा कर रही हैं कि फिल्म हर हाल में रिलीज होगी, वहीं फिल्म रिलीज को लेकर तोड़फोड़ समेत अन्य तरह से विरोध-प्रदर्शन जारी है।
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हालांकि अब तक  किसी ने भी फिल्म नहीं देखी है लेकिन आरोप है कि फिल्म में इतिहास से जुड़े तथ्यों और प्रस्तुति के स्तर पर छेड़छाड़ की गई है। ‘अमर उजाला’ से बातचीत में विभिन्न राजघरानों से जुड़े प्रतिनिधियों ने भी अलग-अलग तर्कों के साथ अपनी सहमति-असहमति दर्ज कराई है।

दिलीपपुर राजघराने की राजकुमारी भावना सिंह ने साफ तौर पर कहा, संजय लीला भंसाली अपनी फिल्मों को लेकर अक्सर विवाद में आ जाते हैं। वह थोड़ा बहुत कुछ न कुछ उल्टा कर देते हैं, जो एक समूह को ‘हर्ट’ करता है। ऐसा नहीं होना चाहिए। वैसे पद्मावती फिल्म को रिलीज करने से पहले बेहतर हो कि विशेषज्ञों की टीम इसे देखे और तय करे कि इसमें इतिहास से कितनी छेड़छाड़ की गई है। फिर फिल्म रिलीज की जाए।
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कालाकांकर राजभवन की राजकुमारी और पूर्व विदेश मंत्री राजा दिनेश सिंह की बेटी पूर्व सांसद रत्ना सिंह ने यह तो कहा कि मैंने अब तक फिल्म नहीं देखी है लेकिन यह भी जोड़ा कि इतिहास से खिलवाड़ का हक किसी को भी नहीं है। विवाद एक घूमर नृत्य को लेकर है। इसे राजपूत परिवार की महिलाएं घर और घूंघट के भीतर करती हैं लेकिन फिल्म में इसे तोड़-मड़ोरकर ठुमके के साथ थोड़ा अश्लील रूप दिया गया है। फिल्में समाज का आइना होती हैं। इसके माध्यम से कोई गलत संदेश नहीं जाना चाहिए। भारतीय महिलाओं के मान-स्वाभिमान से खिलवाड़ उचित नहीं है। फिर रानी पद्मावती इतिहास का बड़ा चेहरा हैं। उनका मान होना ही चाहिए।

वहीं प्रतापगढ़ राजघराने के राजा अनिल प्रताप सिंह तो इसे तीन घंटे का एंटरटेनमेंट मानते हैं। बोले, इतिहास अपनी जगह पर है और फिल्म पद्मावती इतिहास पर नहीं है। विदेशों में भी इतिहास पर ढेर सारी फिल्में बनती हैं, लेकिन कहीं विरोध नहीं होता है। हालांकि मैंने फिल्म नहीं देखी है, लेकिन मेरा मानना है कि इतिहास से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है।

राज्य सभा सांसद और बरांव स्टेट के कुंवर रेवती रमण सिंह ने भी फिल्म के विरोध को लेकर सवाल उठाए। कहा, सेंसर बोर्ड सर्वोच्च संस्था है, उचित या अनुचित का फैसला वही करेगा। जहां तक विरोध दर्ज कराने की बात है तो सेंसर बोर्ड के सामने विरोध दर्ज कराया जाना चाहिए। फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई है। वैसे जौहर तो राजपूताने की परंपरा रही है, फिर काहे का विरोध है।

लोकस्मृतियां और साक्ष्य भी इतिहास का हिस्सा हैं। जायसी ने फारसी, उत्तर भारत की बोली और राजस्थानी में लिखे तीन अलग-अलग संदर्भों की पुष्टि के आधार पर पद्मावत लिखा। वहीं समकालीन खुसरो ने चित्तौड़ के जौहर के बारे में तो लिखा है, लेकिन रानी नहीं रानियों का जिक्र है। वैसे भी राजस्थान में रानियों को उनके नाम नहीं, राजघराने से जोड़कर जाना जाता था। पद्मावती किसी स्त्री का नाम नहीं बल्कि खूबियों के आधार पर स्त्री का वर्ग है। यह भी कि पद्मावती के खिलजी से मुलाकात या छायादर्शन जैसे प्रसंगों का कोई आधार नहीं है। अब अगर इन तथ्यों के साथ फिल्मांकन है तो उसे इतिहास से छेड़छाड़ कह सकते हैं, अन्यथा नहीं।
0 प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी
अध्यक्ष, मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय

यह बेहद अनुचित बात है कि एक ऐतिहासिक संदर्भ पर फिल्म बनाने से पहले न तो उस राजपरिवार से संपर्क किया गया और न ही उसकी अनुमति ली गई। हैरानगी यह भी कि जो वीरांगना सीधे तौर पर अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहती थी, जिसने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए जौहर कर लिया, उसे हम नृत्य करते हुए कैसे दिखा सकते हैं। इतिहास मनोरंजन का विषय नहीं बल्कि सच्चाई पर आधारित होता है। यह राजपूतों के गौरव को धूमिल करने का कुत्सित प्रयास है। यदि उस राजपरिवार से संपर्क करके उनसे तथ्य और अनुमति लेकर फिल्म बनाई जाए तो हमें कोई एतराज नहीं है।
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0 डॉ.संजय सिंह
अमेठी राजपरिवार, अध्यक्ष,अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
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