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Mahakumbh : अखाड़ों को जमीन आवंटन शुरू होने से पहले छिड़ी रार, 25 प्रतिशत ज्यादा मांग रहे भूमि

Sat, 16 Nov 2024 02:42 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी का कहना है कि महाकुंभ संतों का समागम होता है, जिसमें अखाड़ों से जुड़े देश-विदेश के संत-महात्मा पहुंचते हैं। ऐसे में अखाड़ों को पर्याप्त भूमि नहीं मिलने पर बड़ी संख्या में साधु-संत महाकुंभ में नहीं आ सकेंगे।
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भूमि का जायजा लेते अखाड़ा परिषद के साधु-संत। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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महाकुंभ से पहले अखाड़ों को जमीन आवंटन की प्रक्रिया के साथ ही रार शुरू हो गई है। मेला प्रशासन की ओर से कम भूमि के प्रस्ताव पर अखाड़ों ने नाराजगी जताई है, जबकि मेला प्रशासन की ओर से पिछले वर्ष से अधिक भूमि अखाड़ों को देने का दावा किया गया है। बताया जा रहा है कि अखाड़ों की ओर से पिछले महाकुंभ की अपेक्षा 25 प्रतिशत तक भूमि बढ़ाने की मांग की जा रही है, जबकि मेला प्रशासन ने इससे हाथ खड़े कर दिए हैं। अब 18 और 19 नवंबर को अखाड़ों को जमीन आवंटित करने की तैयारी है। इसमें विवाद की आशंका को देखते हुए जमीन आवंटन से पहले मेला प्रशासन की ओर से अखाड़ों के प्रतिनिधियों से फिर वार्ता की जा सकती है।

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अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी का कहना है कि महाकुंभ संतों का समागम होता है, जिसमें अखाड़ों से जुड़े देश-विदेश के संत-महात्मा पहुंचते हैं। ऐसे में अखाड़ों को पर्याप्त भूमि नहीं मिलने पर बड़ी संख्या में साधु-संत महाकुंभ में नहीं आ सकेंगे। उन्होंने कहा कि मेला प्रशासन की ओर से अधिक से अधिक संस्थाओं को भूमि आवंटित करने पर जोर दिया जा रहा है, जबकि अखाड़ों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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मेला प्रशासन का दावा- पहले से ज्यादा दी जा रही है भूमि

दूसरी ओर मेला प्रशासन का कहना है कि अखाड़ों को पिछले महाकुंभ की तुलना में इस बार अधिक जमीन दी जा रही है, लेकिन अखाड़ों की ओर से 25 प्रतिशत तक भूमि बढ़ाने की मांग की जा रही है, जो संभव नहीं है। विदित हो कि पिछले महाकुंभ में करीब पांच हजार संस्थाओं को जमीन आवंटित की गई थी, जबकि इस बार इनकी संख्या सात हजार से अधिक होने की संभावना जताई जा रही है। यही कारण है कि महाकुंभ मेले का क्षेत्रफल बढ़ने के बाद भी एकबार फिर जमीन आवंटन से पहले रार शुरू हो चुकी है।

विदित हो कि महाकुंभ में अखाड़ों के बीच विवाद कोई नई बात नहीं है। इससे पूर्व पेशवाई, शाही स्नान का समय निर्धारण, अखाड़ों की प्राथमिकता और सुविधाओं के बंटवारे को लेकर विवाद होते रहे हैं। दरअसल, अखाड़े अपने अधिकारों और परंपराओं को लेकर बेहद संवेदनशील होते हैं, जो अक्सर टकराव का कारण बनते हैं। यही नहीं नए अखाड़ों को शामिल करने और उन्हें अधिकार देने पर पुराने अखाड़े असंतोष व्यक्त करते हैं, जो कई बार विवाद का कारण बने हैं।
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