हाईकोर्ट ने कहा है कि बिना किसी आरोप या गलती के कर्मचारी का बार-बार स्थानांतरण करना उसे दंड देने के समान है। राजनीतिक दबाव में कर्मठ और ईमानदारी अधिकारी का 10 साल में 11 बार स्थानांतरण और पिछले ढाई वर्ष में छह बार स्थानांतरण करना अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करना है।
कोर्ट ने नगरपालिका परिषद गढमुक्तेश्वर हापुड में अधिशासी अधिकारी अमिता वरुण का बार-बार तबादला कर परेशान करने पर निदेशक स्थानीय निकाय पर 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। उनका स्थानांतरण नगर पालिका परिषद मरहरा स्थानांतरित करने का आदेश रद्द कर दिया है।
अमिता ने याचिका दाखिल कर अपने तबादले को चुनौती दी थी। याचिका पर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति नीरज त्रिपाठी ने सुनवाई की। याचिका पर अधिवक्ता प्रभाकर अवस्थी ने पक्ष रखा। विशेष सचिव ने निदेशक को मंत्री की इच्छा का पालन करते हुए याची का स्थानांतरण करने का आदेश दिया। इसके बाद उनका तबादला कर दिया गया।
इस पर नाराजगी जताते हुए कहा ने कहा कि निदेशक नियुक्ति प्राधिकारी हैं। इस नाते वह स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं। मगर राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम करने की अधिकारियों की प्रवृत्ति बनती जा रही है। इसके चलते ईमानदारी अधिकारियों को परेशान किया जा रहा है।
इस प्रकार के प्रयास अधिकारी को राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम करने के लिए विवश करने हेतु किए जाते हैं। याची पर न तो भ्रष्टाचार का कोई आरोप है और न ही उसके खिलाफ विभागीय कार्यवाही चल रही है। एक महिला अधिकारी को मात्र इसलिए परेशान किया जा रहा है क्योंकि वह राजनीतिक आकाआें की इच्छा के विपरीत कानून के मुताबिक काम कर रही हैं।
बार-बार स्थानांतरण करने से काम करने वाले ईमानदार अधिकारी हतोत्साहित होते हैं। अधिकारियों ने नेताओं की इच्छा के आगे समर्पण कर दिया है, जबकि कानूनन उनको स्वतंत्र निर्णय लेने का पूरा अधिकार है।
कोर्ट का कहना था कि स्थानांतरण सेवा का हिस्सा है मगर यह प्रशासनिक वजह से या जनहित में किया जाना चाहिए। नेताओं के इशारे पर बार-बार स्थानांतरण करना दुर्भावानापूर्ण और दंडात्मक है।