इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी के जाति प्रमाणपत्र की वैधता की जांच की जा चुकी हो और कोई नया साक्ष्य या धोखाधड़ी के सुबूत नहीं हैं तो उसी मामले को बार-बार खोलना गलत है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति नीरज तिवारी, न्यायमूर्ति गरिमा प्रशांत की खंडपीठ ने प्रयागराज के अफजाल अहमद व एक अन्य के खिलाफ जाति सत्यापन से संबंधित लंबित कार्यवाही को बंद करने का आदेश दिया है।अफजाल अहमद का ‘भिश्ती अब्बासी’ जाति प्रमाणपत्र बना है। 2011 में एक शिकायत पर इनके जाति प्रमाणपत्र को चुनौती दी गई थी।
जिला स्तरीय जाति जांच समिति की 2014 और 2016 की जांच में प्रमाणपत्र वैध पाए गए थे। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी 2015 में इस शिकायत को निराधार मान मामले को समाप्त करने का आदेश दिया था। इसके बावजूद क्षेत्रीय और राज्य स्तरीय समितियों की ओर से मामले को बार-बार रिमांड पर भेजकर नई जांच के आदेश दिए जा रहे थे। इस पर याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने कहा कि कुमारी माधुरी पाटिल बनाम अतिरिक्त आयुक्त मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार जाति सत्यापन की प्रक्रिया एक बार पूरी होने के बाद उसे अंतिम रूप प्राप्त होना चाहिए।
वर्तमान मामले में कोई भी ऐसा नया तथ्य या धोखाधड़ी का प्रमाण सामने नहीं है। ऐसे में केवल आरोपों के आधार पर बार-बार जांच बैठाना ठीक नहीं है। कोर्ट ने शिकायतकर्ता के बेटे (प्रतिवादी संख्या-5) के हस्तक्षेप पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा संबंधी लाभों से जुड़े जाति विवादों में किसी तीसरे पक्ष या अजनबी व्यक्ति को तब तक हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है, जब तक कि वह कोई प्रत्यक्ष कानूनी क्षति या स्पष्ट धोखाधड़ी साबित न कर दे।