फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कोसों दूर एटीएम, नहीं जानते पेटीएम

Sun, 25 Dec 2016 01:40 AM IST
अमित सरन, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
विज्ञापन
cashless
विज्ञापन
‘देखा ई सब हम न कइ पाइब। स्वेप मशीन से दुकानदार के पइसा देइब तो जादा काट लेई। दुकानदार ठग लेहिएं, का करब जउन बा?’ कैशलेश व्यवस्था की पहली कड़ी स्वाइप मशीन के बारे में मेजा के रामचंद्र पूरा निवासी राजेंद्र प्रसाद का यही कहना है। नेवहइया के नेब्बू लाल भारतीय के पास कीपैड वाला एक पुराना सामान्य मोबाइल है, जो उन्होंने 1200 रुपये में खरीदा था। मोबाइल की स्क्रीन चिटकी हुई है और पीछे बैटरी पर लगा कवर अक्सर खुलकर गिर जाता है, ऐसे में उन्होंने मोबाइल पर रबर बैंड लगा रखा है। इसके बावजूद मोबाइल शान से लेकर चलते हैं, क्योंकि गांव में गिने-चुने परिवारों के पास ही मोबाइल है। इंटरनेट के बारे में न कभी सुना और न ही कुछ जानते हैं। संवाददाता ने जब उनसे पूछा कि पेटीएम के बारे में जानते हैं? तो बोले, ‘ई जगहा इलाहाबाद में ना बाटइ।’
विज्ञापन


ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हर दूसरे शख्स की कैशलेस व्यवस्था के प्रति यही धरणा है। वर्ष 2011 की जगनणना के मुताबिक जिले की आबादी 59 लाख 59 हजार है, जिसमें ग्रामीण इलाकों की आबादी 45 लाख 92 हजार 251 है। यानी कुल जनसंख्या की 76 फीसदी आबादी ग्रामीण इलाकों में बसी है। पांच वर्षों में आबादी तो बढ़ी लेकिन शहरी और ग्रामीण जनसंख्या का अनुपात पुराना ही है। ग्रामीण इलाकों में बसी आबादी में 80 फीसदी से अधिक लोग पैसा निकालने के लिए भी एटीएम का इस्तेमाल करना नहीं जानते। ऐसे में कैशलेस व्यवस्था इनके लिए किसी अजूबे से कम नहीं है।

- फूलपुर बाजार में दो दुकानदारों ने स्वाइप मशीन लगवा रखी है। नोटबंदी के बार शंकरगढ़ में भी कुछ दुकानदारों ने स्वाइप मशीन लगवाई है, लेकिन वहां सिर्फ बारा पॉवर प्लांट के कुछ अफसर, कर्मचारी और उनके परिवार के लोग ही स्वाइप मशीन से खरीदारी करते हैं। शंकरगढ़ बाजार में प्रदीप गारमेंट के संचालक अरविंद केसरवानी का कहना है कि उनके समेत कस्बे के आधा दर्जन व्यापारियों ने स्वाइप मशीन लगा रखी है, लेकिन इन दुकानों में अब तक किसी भी स्थानीय ग्रामीण ने स्वाइप मशीन का इस्तेमाल नहीं किया है। ऐसे में मशीनों पर धूल जमने लगी है। 
विज्ञापन


- यमुनापार में बड़ी संख्या खनन मजदूरों की है। इनमें से 90 फीसदी मजदूरों को बैंकों में खाता ही नहीं खुला है। खनन मजदूर रंजीत, माता प्रसाद, सुरेश, गुलाबकली आदिवासी, मैहर कोल, जीवन लाल से जब पूछा गया कि एटीएम है तो बोले कि हम पत्थर तोड़ने वाले मजदूर हैं। रोज कमाते और खाते हैं। एटीएम के बारे में न कभी सुना और न ही देखा। बैंक में कभी कदम भी नहीं रखा। 

- जिले की मौजूदा आबादी 64 लाख के आसपास पहुंच रही है। इनमें लाखों की संख्या में मजदूर हैं, जिनके पास मोबाइल ही नहीं है। बड़ी संख्या में मजदूर मध्य प्रदेश से आकर यहां बसे हैं। श्ंाकरगढ़ में आकर बसे शिवराम, हलकू समेत तमाम मजदूरों का कहना है कि घर में संपर्क करना होता है तो यहां से 10 किलोमीटर दूर पीसीओ तक जाना पड़ता है। मोबाइल फोन देखा जरूर है लेकिन कभी इस्तेमाल नहीं किया।

- अपने ही पैसे के लिए बैंकों और एटीएम के चक्कर काट रहे ग्रामीण कैशलेस व्यवस्था को नई मुसीबत मान रहे हैं। यमुनापार में लालापुर के रहने वाले सीके यादव, सूर्य निधान पांडेय, नरेंद्रमणि त्रिपाठी, छेदीलाल का कहना है कि लालपुर में बैंक शाखा हैं, लेकिन उसका कोई एटीएम नहीं। बैंक में अक्सर पैसा खत्म रहता है। ऐसे में ग्रामीणों को 20 से 25 किलोमीटर दूर एटीएम तक जाना पड़ता है। यही हाल मेजा में है। मेजा रोड से मांडा रोड के बीच 25 किलोमीटर का फासला है। इस फासले में 50 से अधिक गांव पड़ते हैं और इनके बीच सिर्फ एक एटीएम है। ग्रामीणों का कहना है कि कैश के नाम पर मुसीबत अभी कम नहीं हुई और कैशलेस व्यवस्था उनके सामने नई मुसीबत बनकर आ गई।


‘स्वाइप मशीन की मांग तेजी से बढ़ी है लेकिन 85 फीसदी डिमांड शहरी क्षेत्र से है। ग्रामीण इलाकों के खाताधारकों की संख्या महज 15 फीसदी है। स्वैप मशीन के लिए करेंट खाता होना अनिवार्य है।’ अनिल सिन्हा, मुख्य प्रबंधक, एसबीआई
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें