इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में आरोपी की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और सुसंगत हो तो अन्य गवाहों के बयान न होने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में आरोपी की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और सुसंगत हो तो अन्य गवाहों के बयान न होने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता। यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज बजाज की पीठ ने अमर नाथ सिंह की अपील खारिज करते हुए दिया। आजमगढ़ के अपर सत्र न्यायाधीश की ओर से 1986 में आरोपी को दुष्कर्म का दोषी मानते हुए सात साल के कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
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बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि उसे झूठा फंसाया गया है। अभियोजन ने जानबूझकर पीड़िता की मां और एक अन्य गवाह को पेश नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने शुरू से ही आरोपी का नाम लिया और अदालत में भी अपने बयान पर कायम रही। केवल इस आधार पर कि पीड़िता की मां और अन्य गवाह का बयान नहीं हुआ, अभियोजन के मामले पर संदेह नहीं किया जा सकता। खासकर जब पीड़िता की गवाही स्पष्ट और भरोसेमंद हो। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ अपराध सिद्ध है और सजा में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।