इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मनरेगा से जुड़े सोशल ऑडिट कर्मियों के मानदेय वृद्धि मामले में राज्य सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया। कहा, बिना कारण बताए किसी दावे को खारिज करना न्यायसंगत नहीं है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मनरेगा से जुड़े सोशल ऑडिट कर्मियों के मानदेय वृद्धि मामले में राज्य सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया। कहा, बिना कारण बताए किसी दावे को खारिज करना न्यायसंगत नहीं है। साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को तीन सप्ताह में नया कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकल पीठ ने याची राम नगिना व अन्य की ओर से दायर याचिका पर दिया।
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याची राम नगिना और अन्य सोशल ऑडिट से जुड़े पदों पर कार्यरत हैं। याचियों की ओर से मांग की गई थी कि 2018 में मनरेगा कर्मियों के मानदेय में 40 प्रतिशत की वृद्धि गई थी। लेकिन, सोशल ऑडिट से जुड़े कर्मियों को उस समय सिर्फ 20 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी मिली। इनका आरोप था कि पहले दो योजनाओं की ऑडिट करते थे, अब पांच योजनाएं हैं। पहले तीन दिन काम करना होता था।
अब पांच दिन। इस आधार पर कार्यकारिणी समिति ने 24 मार्च 2025 को प्रस्ताव पास किया कि इन्हें बाकी बचा हुआ 20 प्रतिशत मानदेय भी बढ़ाया जाए। सोशल ऑडिट निदेशालय ने यह प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा। लेकिन, राज्य सरकार ने 11 दिसंबर 2025 को इसे खारिज कर दिया। शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि प्रस्ताव उपयुक्त न पाए जाने के कारण खारिज किया गया।