इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी बच्चे की ओर भरण-पोषण के लिए पिता के खिलाफ दायर याचिका में कमाने वाली मां को पक्षकार बनाना जरूरी नहीं है। हालांकि, अंतिम भरण-पोषण राशि निर्धारित करते वक्त संयुक्त आय का आकलन जरूरी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी बच्चे की ओर भरण-पोषण के लिए पिता के खिलाफ दायर याचिका में कमाने वाली मां को पक्षकार बनाना जरूरी नहीं है। हालांकि, अंतिम भरण-पोषण राशि निर्धारित करते वक्त संयुक्त आय का आकलन जरूरी है। यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने अरविंद कुमार की आपराधिक पुनरीक्षण अर्जी पर दिया है।
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आजमगढ़ निवासी याची ने परिवार न्यायालय में नाबालिग बेटी की ओर से दायर भरण-पोषण याचिका में पत्नी को पक्षकार बनाने के लिए आवेदन किया था, जो खारिज हो गया। इसे याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। अधिवक्ता ने दलील दी कि याची रेलवे में क्लर्क है। उसकी मासिक आय 41 हजार रुपये है। वहीं, उसकी पत्नी पुलिस कांस्टेबल है और उसकी आय लगभग 55 हजार रुपये है। ऐसे में बेटी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी संयुक्त है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आवेदक मुकदमे का प्रमुख होता है। केवल इसलिए कि नाबालिग बच्चे की मां भी आय अर्जित कर रही है, पिता को बच्चे के भरण-पोषण के अपने वैधानिक दायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि जब दोनों माता-पिता कमाने वाले सदस्य हों तो बच्चे के भरण-पोषण की संयुक्त जिम्मेदारी होती है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुख्य आवेदन पर निर्णय लेते समय, परिवार न्यायालय माता-पिता की आय और वित्तीय क्षमता को ध्यान में रखेगा।