कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि पत्नी की ओर से गहनों की पेश की गईं रसीदें सिर्फ फोटोकॉपी थीं, जिन्हें न तो कोर्ट में साबित किया गया और न ही उनका कोई गवाह पेश किया गया। ऐसी स्थिति में इन रसीदों को द्वितीयक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के फैसले को रद्द करते हुए हिंदू विवाह अधिनियम का जिक्र भी किया। कहा कि धारा 27 केवल तलाक या वैवाहिक विवाद के दौरान संपत्ति विवाद निपटाने के लिए है। अकेले स्त्रीधन की मांग के लिए उसका उपयोग ‘कानूनी छल’ के समान है। लिहाजा, 10.54 लाख रुपये की स्त्रीधन वापसी की डिक्री न सिर्फ असांविधानिक है, बल्कि पारिवारिक न्यायालय के क्षेत्राधिकार के बाहर पारित किया गया आदेश है।
फैसले की तीन बड़ी बातें:
1.हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 के तहत स्त्रीधन की मांग सिर्फ तलाक याचिका के साथ की जा सकती है।
2. पारिवारिक न्यायालय स्वतंत्र रूप से धारा 27 के अंतर्गत वाद सुनवाई नहीं कर सकता।
3. फोटोकॉपी रसीदें तबतक द्वितीयक साक्ष्य नहीं मानी जा सकतीं, जब तक उनकी मूल कॉपी नष्ट होने का विधिसम्मत प्रमाण न हो।