ऐसे तैयार हुआ सेंसर
वैज्ञानिकों ने सबसे पहले प्रयोगशाला में सिल्वर नाइट्रेट और निनहाइड्रिन के अलग-अलग जलीय विलयन (आसुत जल में) तैयार किए। इसके बाद दोनों विलयनों को मिलाकर आइस बाथ में लगातार घुमाया गया। मिश्रण में धीरे-धीरे सोडियम बोरोहाइड्राइड का विलयन बूंद-बूंद करके मिलाया गया। एक घंटे यह प्रक्रिया चलने के बाद भूरे रंग का निनहाइड्रिन-क्रियात्मक सिल्वर नैनोकणों का कोलॉयडल विलयन प्राप्त हुआ। विश्लेषण में लगभग 15 नैनोमीटर आकार के निनहाइड्रिन-क्रियात्मक सिल्वर नैनोकण बनने की पुष्टि हुई। इसी कोलॉयडल विलयन की सहायता से रमन सेंसर तैयार किया गया। आर्सेनिक मिश्रित पानी की जांच की गई, जिसमें एक सेकंड से भी कम समय में पानी में आर्सेनिक मिले होने की पुष्टि हुई।
क्या है रमन सेंसर
रमन सेंसर एक अत्याधुनिक वैज्ञानिक उपकरण है, जो रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक पर आधारित है। इसमें लेजर प्रकाश की मदद से किसी पदार्थ के अणुओं की पहचान की जाती है। जब लेजर की किरण किसी नमूने पर पड़ती है तो उससे निकलने वाला बिखरा प्रकाश उस पदार्थ की रासायनिक संरचना की जानकारी देता है। इसी आधार पर रमन सेंसर पानी में मौजूद आर्सेनिक जैसी विषैली भारी धातु की बहुत कम मात्रा का भी तेजी व सटीकता से पता लगाता है।
अगले चरण में तैयार किया जाएगा एप
प्रो.केएन उत्तम ने बताया कि शोध के अगले चरण में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से एप तैयार किया जाएगा, ताकि आम लोग भी इस तकनीक का इस्तेमाल कर पानी की जांच कर सकें। इस दिशा में प्रयोगशाला स्तर पर काम शुरू हो चुका है।
पठारी इलाकों के लिए संजीवनी बनेगा रमन सेंसर
रमर सेंसर का अविष्कार पठारी इलाकों में रहने वालों के लिए संजीवनी की तरह काम करेगा। हाल ही में प्रयागराज के शंकरगढ़ विकासखंड के कई गांवों में कैंसर की बीमारी तेजी से फैलने की बात सामने आई है। प्रो.उत्तम बताते हैं कि शंकरगढ़ पठारी इलाका है। पत्थरों में मौजूद आर्सेनिक बारिश के पानी के साथ भूजल में मिल जाता है। सिर्फ शंकरगढ़ नहीं, बल्कि देश के सभी पठारी इलाकों के भूजल में आर्सेनिक की जांच का त्वरित पता लगाने में रमन सेंसर की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।