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प्रयागराज : इतिहास के गुमनाम राष्ट्र नायकों को मिलेगा नाम, इतिहास में छिपे तथ्यों को लाया जाएगा सामने

Sun, 27 Mar 2022 05:52 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

सरस्वती हाईटेक सिटी, नैनी स्थित राज्य विवि के नवनिर्मित परिसर में आयोजित होने जा रही संगोष्ठी में ‘क्षेत्रीय इतिहास लेखन के निर्माण में चुनौतियां, समस्याएं एवं समाधान’ और ‘इतिहास लेखन के निर्माण में पुस्तकालयों की उपादेयता’ विषयों पर मंथन किया जाएगा।
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विस्तार
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बहुत कम लोगों को पता होगा कि कौशाम्बी की अपनी पांडुलिपि थी। प्राचीन काल की यह पांडुलिपि कैसी थी, उस वक्त कैसे व्यापार होता था, इसका वर्णन इतिहास में बहुत कम मिलता। स्वतंत्रता संग्राम में फाफामऊ, प्रतापगढ़, फूलपुर से भी कई राष्ट्र नायकों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, लेकिन इतिहास में वे गुमनाम हैं।

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चंद लोगों के नाम ही सामने आते हैं। इतिहास के पन्नों में फांसी इमली नाम के पेड़ का कहीं जिक्र नहीं मिलता, जहां तमाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने शहादत दी। इतिहास के गुमनाम राष्ट्र नायकों और ऐसे ही महत्वपूर्ण तथ्यों की खोज के लिए प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भइया) राज्य विश्वविद्यालय में 29 एवं 30 मार्च को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी होने जा रही है।


सरस्वती हाईटेक सिटी, नैनी स्थित राज्य विवि के नवनिर्मित परिसर में आयोजित होने जा रही संगोष्ठी में ‘क्षेत्रीय इतिहास लेखन के निर्माण में चुनौतियां, समस्याएं एवं समाधान’ और ‘इतिहास लेखन के निर्माण में पुस्तकालयों की उपादेयता’ विषयों पर मंथन किया जाएगा।

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इतिहास में छिपे तथ्यों को सामने लाना उद्देश्य

राज्य विवि के जनसंपर्क अधिकारी अविनाश कुमार श्रीवास्तव का मानना है कि इतिहास लेखन निष्पक्ष नजरिये से होना चाहिए। मुख्य धारा के इतिहास को खास माइंडसेट से लिखा गया। प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. राज कुमार गुप्ता उदाहरण देते हैं कि 1921 से पहले लोग यही जानते थे कि समुद्रगुप्त के बाद चंद्रगुप्त द्वितीय शासक की गद्दी पर बैठा। बाद में कुछ पुस्तकों के हवाले से एक सेमिनार में यह तथ्य सामने आया कि समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय के बीच रामुगप्त नाम का शासक गद्दी पर बैठा था।



संगोष्ठी का उद्देश्य यही है कि इतिहास के ऐसे छिपे तथ्यों को सामने लाया जाए। लोग जानें की वास्तविक इतिहास क्या है। प्राचीन इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रशांत सिंह का कहना है कि हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है कि इतिहास लेखन में कहां और क्या खामियां रह गईं।



डॉ. प्रशांत के अनुसार संगोष्ठी में 200 शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे, जिनमें क्षेत्रीय इतिहास से जुड़े कई नए तथ्य सामने आएंगे। रिसर्च पेपर में उपलब्ध नए तथ्यों को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के सहयोग से प्रकाशित किया जाएगा। दो दिनी संगोष्ठी में देश भर से इतिहासकार जुड़ेंगे। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडेय मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होंगे।
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