फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राहत इंदौरी का प्रयागराज से रहा गहरा नाता, कई कार्यक्रमों में की थी शिरकत

Wed, 12 Aug 2020 01:15 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
विज्ञापन
prayagraj news - फोटो : prayagraj
विज्ञापन

मशहूर शायर राहत इंदौरी का प्रयागराज से करीबी नाता रहा। वह प्रयागराज की हर चाहत पर हर न्योते पर यहां आना नहीं भूले। उनके जाने से प्रयागराज के अदीबों, रचनाकारों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। आखिरी बार पिछले वर्ष वह ट्रिपल आईटी के एक कवि सम्मेलन में जब आए थे, तब अपनी शायरी से सबका दिल जीत कर ले गए थे।

विज्ञापन


डॉ राहत  इंदौरी का बेबाकी से अपनी बात रखने का अंदाज निराला था। जन कवि कैलाश गौतम के बुलावे पर  वह बहुत बार इलाहाबाद आए। विनोद चंद्र दुबे ने उन्हें याद करते हुए कहा कि पहली बार राहत भाई 1974 में यहां आए थे। फिर 1979 में वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मुशायरे में आए। वर्ष 2000 में बार का अध्यक्ष बनने पर मेरे बुलावे पर लगातार तीन वर्षो तक वह यहां आते  रहे।

राहत इंदौरी(फाइल फोटो)
वह उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के भी कार्यक्रम में आए थे। पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय में कई बार उनका आना-जाना हुआ। वह चाहे एमएनआईटी का मुशायरा रहा हो या फिर कैलाश गौतम सृजन संस्थान का कवि सम्मेलन। डॉ राहत इंदौरी आखिरी बार वर्ष 2019 मार्च में ट्रिपल आईटी के कवि सम्मेलन में आए थे।उस कवि सम्मेलन की अध्यक्षता राहत ने और संचालन डॉ श्लेष गौतम ने किया था। बुद्धिसेन शर्मा के अनुसार राहत इंदौरी का जाना देश और शायरी दोनों के लिए अपूरणीय क्षति है।
विज्ञापन

राहत इंदौरी - फोटो : अमर उजाला
डॉ श्लेष गौतम ने कहा कि उनके कहने का अंदाज उनकी निडरता और अलमस्त फकीर की तरह से उनका जीना कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनके साथ देश के कई काव्य मंचों पर शिरकत करने और संचालन करने का मौका मिला। उन्होंने मेरी किताब का लोकार्पण भी किया था। कहा था अदब की खिदमत रुकनी नहीं चाहिए। कैलाश भाई की विरासत बढ़ती रहनी चाहिए। डॉ देवी प्रसाद कुंवर ने कहा राहत साहब वास्तव में गंगा-जमुनी तहजीब की जीती जागती मिसाल थे। वह हिंदी उर्दू के मंचों पर समान रूप से लोकप्रिय थे। डॉ नीरज त्रिपाठी ने कहा कि वह नफरत की तिजारत करने वालों के खिलाफ  सीना ठोंक कर बेखौफ शेर पढ़ने वाले शायर थे। 

राहत साहब बहुत जिंदादिल इंसान थे। उनकी शायरी एक ऐसा जोश भरती थी, कि हर आम और खास उनके साथ हो लेता था। पूर्व अपर महाधिवक्ता एवं शायर कमरुल हसन सिद्दीकी।
 
तहजीब का एक जगमगाता हुआ नाम अपने बीच से चला गया। प्रयागराज को वह साहित्य का मक्का मानते थे। मंच के बेताज बादशाह होकर भी वह तनिक भी व्यावसायिक नहीं थे। हिंदुस्तानी तहजीब की नुमाइंदगी करते थे।उनका एक शेर याद आ रहा है-तुम मुझे शहर की तकलीफ बता जाते हो/मेरी आंखों में बड़ी देर धुआं होता है...।  गीतकार यश मालवीय।
 
वह मुशायरों के बेताज बादशाह, बुलंद आवाज के जादूगर और उर्दू तहजीब के बहुत बड़े नुमाइंदे थे। उन्हीं के शब्दों में- ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था/मैं बच भी जाता तो इक रोज मरने वाला था...। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।साहित्यकार रविनंदन सिंह।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें