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क्वाइव रोड की शान है बच्चन का ‘दस द्वार वाला बंगला’

Mon, 15 May 2017 02:12 AM IST
अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद के कमाल के बंगलों में ‘मधुशाला’ के प्रणेता हरिवंश राय बच्चन का 17, क्लाइव रोड वाला बंगला भी शुमार है। हालांकि बच्चन जी यहां बतौर किराएदार ही रहे लेकिन उनके प्रवास और अनेक महत्वपूर्ण साहित्यिक गतिविधियों के कारण यह बंगला उन्हीं के नाम से मशहूर हो गया। पांच दरवाजे, तीन खिड़कियों और दो रोशनदान यानी दस द्वार वाले कमरे के कारण भी यह ‘दस द्वार वाला बंगला’ कहलाया। वैसे वास्तु के नियमों से बने इस बंगले का नाम ‘सूर्यभेदी भवन’ भी है क्योंकि इसके प्रत्येक कमरे में सूर्य की किरणें सीधे पड़ती हैं। मुख्य द्वार और पीछे का निकास दोनों एक ही सीध में हैं।
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लोहे की पटरियों के सहारे खुलने और बंद होने वाले भारी भरकम गेट पर लगी तख्ती ‘कुत्तों से सावधान’ पढ़कर आपके पांव ठिठक सकते हैं, लेकिन यह बोर्ड दशकों पहले बेमानी हो चुका था। कभी कुत्ते बंगले की रखवाली के लिए रहे होंगे, अब तो  वहां ट्रस्ट के सदस्य, खानसामा, सफाईकर्मी सहित अंगुलियों पर गिनने भर को लोग भी नहीं रहते हैं। बाहर लान, रोशनी के लिए लैंपपोस्ट, दोनों किनारे पर बाग और शानदार किचेन के अतिरिक्त बंगले में तीस कमरे हैं। पीछे की ओर खुला आंगन है जिसके दोनों ओर कमरे और छत पर जाने के लिए दोनों ओर सीढ़ियां हैं।

कभी नगर निगम के अधिशासी अभियंता भार्गव ने तकरीबन दस बीघे में यह बंगला बनवाया था। जाने कौन सी स्थितियां बनीं कि भार्गव ने यह बंगला महानिर्वाणी अखाड़े को बेच दिया। तब इसमें तेरह किराएदार रहा करते थे। कवि और शिक्षक हरिवंश राय बच्चन भी उन्हीं में से एक थे। बाबूगंज, पट्टी से पहले कटघर और फिर क्लाइव रोड पर आकर इस बंगले में बसे बच्चन तब तीन कमरों के लिए सात रुपये किराया देते थे। वर्ष 1958 में नई दिल्ली रवाना होने से पहले वह तकरीबन आठ से नौ वर्षों तक यहां रहे।
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किराएदारों का विवाद बढ़ा तो महानिर्वाणी अखाडे़ ने इसे इटावा से सांसद और हाईकोर्ट के तेजतर्रार सीनियर एडवोकेट श्रीशंकर तिवारी को बेच दिया लेकिन तब तक बच्चन यह बंगला छोड़ चुके थे। वर्ष 2009 में तिवारी जी नहीं रहे लेकिन इससे पहले उन्होंने वर्ष 2008 में शैक्षिक गतिविधियों के लिए  ‘श्री शंकर इंदु तिवारी प्रसार न्यास’ बना दिया था। फिलहाल यह बंगला इसी न्यास की देखरेख में है। तिवारी जी के जूनियर एडवोकेट अवधेश अवस्थी कहते हैं, अमिताभ के चुनाव के दौरान भी जया और तेजी बच्चन के साथ हरिवंश राय बच्चन यहां दोबारा आए थे। तब तेजी जी ने यह बंगला खरीदने के लिए तिवारी जी से अनुरोध किया था लेकिन उन्होंने किसी भी कीमत पर इसे बेचने से साफ मना कर दिया था। बच्चनजी की यादों और तिवारी जी की ठसक को संजोए यह बंगला आज भी क्लाइव रोड की कहानी सुनाता है।

क्लाइव रोड वाले बंगले में रहकर अमिताभ और अजिताभ ने पढ़ाई की। तब बच्चन जी अंग्रेजी विभाग के प्रवक्ता थे। वह अपनी साइकिल पर आगे अजिताभ और कैरियर पर अमिताभ को बिठाकर स्कूल छोड़ते और छुट्टी पर उन्हें घर लेकर आते थे। इसी तरह बच्चन जी उन्हें लेटे हनुमान मंदिर भी ले जाते थे। यहां पृथ्वीराज कपूर, निराला, महादेवी, अमृ़तलाल नागर से लेकर कमलापति त्रिपाठी, अरुण गोविल और हेमामालिनी भी आ चुकी हैं। वरिष्ठ कवि यश मालवीय कहते हैं, आतिथ्यप्रेमी बच्चन के लान में भारती जी के संयोजन में परिमल की गोष्ठियां हुआ करती थीं, जिसमें लक्ष्मीकांत वर्मा, डॉ.जगदीश गुप्त, केशवचंद्र वर्मा, उमाकांत मालवीय, गोपीकृष्ण गोपेश आदि शरीक होते थे। यहीं भारती की कहानी ‘गुल की बन्नो’ का पहला पाठ हुआ था।
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