मुकद्दस रमजान का पहला रहमत का अशरा दसवें रोजे के साथ पूरा हुआ। ग्यारहवें रोजे के साथ दूसरा अशरा-ए-मगफिरत शुरू होगा। इस अशरे में की गई नेकियों का सवाब हजार गुना मिलता है। रोजेदारों की ओर से इबादत के साथ सदका, खैरात, जकात दिया जा रहा है।
शहर काजी मुफ्ती शफीक अहमद शरीफी के मुताबिक रोजेदार दूसरे अशरे यानी अशरा-ए-मगफिरत में जाने-अनजाने किए हुए गुनाहों से तौबा करें। खुदा की बारगाह में माफी मांगें और ज्यादा से ज्यादा कुरान की तिलावत करें। गरीबों, फकीरों यतीमों की मदद करें। सदका, जकात, तोहफा दें। रोजेदारों का रोजा खुलवाएं।
शिया जामा मस्जिद, चक के इमाम जुमा व जमात मौलाना सैयद हसन रजा ने कहा, माहे मुकद्दस रमजान के दौरान एक रात की इबादत हजारों महीनों की इबादत से बेहतर है। ग्यारहवां रोजा रखने का सबाब चार हजों, चार उमरों का सवाब है। बारहवें रोजे का सवाब हजारों गुना अधिक है। मगफिरत के अशरे में ज्यादा से ज्यादा नेकी करें। रसूल पाक ने फरमाया है कि रोज़ा जहन्नुम की आग से बचाने का जरिया है। रोजे से इंसान परहेजगार होकर गुनाह और बुराइयों से दूर रहे। जो रोजेदार मगफिरत में अल्लाह की इबादत और अधिक से अधिक नेकियां करता है, अल्लाह उससे खुश होकर उसके सभी गुनाहों को माफ कर देता है।