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प्राफेसर ने कहा वह अरोपी नहीं

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प्रोफेसर की ओर से प्रस्तुत जमानत प्रार्थना पत्र में तर्क रखा गया कि वह नामजद अभियुक्त नहीं है। उन्हें गलत फंसाया गया है। वह विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। सात मार्च को मरकज में शामिल होने दिल्ली गए थे और 10 मार्च को वह लौट आए थे । उसके बाद विश्वविद्यालय की परीक्षा में ड्यूटी भी किया था। तब तक यूपी सरकार की ओर से कोई दिशा-निर्देश जारी नहीं किया गया था, जिसके कारण उन्होंने न सूचना दी और न ही जांच कराई थी। बाद में उन्हें 14 अप्रैल को क्वारंटीन किया गया और जांच रिपोर्ट नेगेटिव आई है। प्रोफेसर की ओर से कहा गया कि वह हर साल मरकज के जलसे में जाते हैं। 21 मार्च को कुछ लोग दिल्ली से आकर बिहार जा रहे थे।
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जनता कर्फ्यू के कारण वह लोग आगे नहीं जा पा रहे थे। मरकज के किसी व्यक्ति ने मुझे फोन करके बताया कि इन्हें वहां रुकना है, जिसके बाद उन्होंने मस्जिद मुसाफिरखाना के प्रबंधक का फोन नंबर दे दिया था। मेरी उन लोगों से कोई मुलाकात नहीं हुई थी और ना ही बात हुई थी। प्रोफेसर के अलावा ख्वाजा सबीउद्दीन, डा. मसीहउल्ला खान, मो. अहमद, मो. तारिक, मो. शकील, वसीम अहमद, रिवानुल हक, मो. मुस्तफा की जमानत अर्जियों पर भी सुनवाई हुई। इन लोगों का पक्ष अधिवक्ता एसए नसीम गुड्डू ने रखा। इनका कहना था कि उपरोक्त लोगों पर विदेशी अधिनियम लागू नहीं होता है क्योंकि वह सभी भारतीय हैं और न तो वे स्वयं संक्रमित हैं और न उनके द्वारा संक्रमण फैलाया गया। कोर्ट ने जमानत का आधार पाते हुए प्रोफेसर शाहिद की जमानत अर्जी मंजूर कर ली है।
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