हाईकोर्ट ने प्रदेश के राजकीय मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं। याचिकाओं में 2015 में 47 प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए जारी विज्ञापन को विभिन्न आधारों पर चुनौती दी गई थी। डॉ. राजेंद्र चौधरी और अन्य की याचिकाओं पर न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव की पीठ ने सुनवाई की।
याची के अधिवक्ता सुनील कुमार का कहना था कि 2015 में लोक सेवा आयोग ने राजकीय मेडिकल कॉलेजों में विभिन्न विभागों में प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया, जिसमें 47 पद थे। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। अधिवक्ता का कहना था कि सभी 47 पद अनारक्षित श्रेणी के हैं। इसमें आरक्षण नियमों की अनदेखी की गई है।
इसी प्रकार से अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष के बजाए 60 वर्ष रखी गई है, जो कि भर्ती नियमावली के विपरीत है। दलील दी गई कि मौजूदा समय में एलोपैथी मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों के 90 से 120 प्रतिशत पद अनारक्षित श्रेणी के हैं। यदि इस विज्ञापन को मिला लिया जाए तो अनारक्षित श्रेणी का कोटा 150 प्रतिशत पहुंच जाएगा।
आयोग के अधिवक्ता का कहना था कि विज्ञापन प्रदेश सरकार के अधियाचन और एमसीआई की गाइड लाइन के अनुसार जारी किया गया है। प्रदेश सरकार के अधिवक्ता का कहना था कि विज्ञापित किए गए पद आरक्षण के दायरे में नहीं आते हैं, इसलिए इन पर आरक्षण नियमावली लागू नहीं होगी। कोर्ट ने याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में 2005 की नियमावली का नियम 15 नहीं लागू होगा। एमसीआई एक्ट में सीधी भर्ती के लिए अर्हता दी गई है और चूंकि विज्ञापन एमसीआई एक्ट के मुताबिक है, इसलिए याचिकाएं पोषणीय नहीं है।