कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड पर भरोसा करने से किया इनकार
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर भरोसा करने से इनकार कर दिया, क्योंकि पाया गया कि महत्वपूर्ण दस्तावेज जैसे पोस्टमार्टम रिपोर्ट और दूसरे ऑपरेशन थिएटर नोट बोर्ड के सामने पेश नहीं किए गए थे। कोर्ट ने यह भी पाया कि एनेस्थेटिस्ट को लगभग साढ़े तीन बजे बुलाया गया था, जिससे संकेत मिलता है कि अस्पताल में तैयारी और सुविधाओं का अभाव था। न्यायाधीश ने टिप्पणी की, "यह पूरी तरह से दुर्घटना का मामला है, जहां डॉक्टर ने मरीज को भर्ती कर लिया और मरीज के परिवार के सदस्यों से ऑपरेशन के लिए अनुमति लेने के बाद भी समय पर ऑपरेशन नहीं किया, क्योंकि उनके पास सर्जरी करने के लिए अपेक्षित डॉक्टर (यानी एनेस्थेटिस्ट) नहीं था।"
अस्पताल ने समय से सामान्य देखभाल नहीं की
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. सुरेश गुप्ता बनाम दिल्ली सरकार और जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि डॉक्टरों को मिलने वाली सुरक्षा तभी लागू होती है जब पेशेवर ने अपने कर्तव्य को कुशलता से निभाया हो। पीठ ने जोर दिया कि यदि मरीज का इलाज करते समय डॉक्टर द्वारा सामान्य देखभाल नहीं की जाती है तो आपराधिक दायित्व उत्पन्न होता है। इस मामले के तथ्यों को देखते हुए, अदालत ने इसे एक "क्लासिक" मामला बताया, जिसमें बिना किसी कारण के ऑपरेशन में 4-5 घंटे की देरी हुई और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भ्रूण की मृत्यु का कारण "लंबे समय तक प्रसव पीड़ा" बताया गया। न्यायालय ने कहा कि यह तथ्य स्पष्ट रूप से डॉक्टर की मरीज को धोखा देने की गलत मंशा को दर्शाता है।
अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि चिकित्सा पेशेवरों को तुच्छ मुकदमों से बचाया जाना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी दोहराया कि यह संरक्षण तभी लागू होगा जब चिकित्सा पेशेवर ने अपने कर्तव्य को कुशलता से निभाया हो। कोर्ट ने कहा कि रोगी के भर्ती होने का समय, सर्जरी का समय और रोगी के परिवार से सहमति लेने का समय इस मामले में तीन महत्वपूर्ण पहलू हैं, जिन पर साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद विचार किया जाना चाहिए। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने मामले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया और याचिका खारिज कर दी।