मुख्य न्यायाधीश ने इस प्रकरण पर सुनवाई के लिए जस्टिस पीबी सावंत, जस्टिस कुलदीप सिंह और जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की तीन सदस्यीय पीठ गठित की। पीठ ने वीसी मिश्र को नोटिस जारी कर उनको पक्ष रखने का निर्देश दिया। अपनी सफाई में वीसी मिश्र में आरोपों का खंडन किया। उन्होंने क्षमा याचना प्रस्तुत की मगर, तीन सदस्यीय पीठ ने वीसी मिश्र की क्षमा याचना को सशर्त की गई क्षमा याचना मानते हुए अस्वीकार कर दिया।
उनको छह सप्ताह के साधारण कारावास की सजा के अलावा वकालत करने पर तीन साल के प्रतिबंध की सजा सुनाई गई। इसके साथ ही पीठ ने वीसी मिश्र की उन सभी पदवियों को छीन लिया जो उनको निर्वाचन या मनोनयन से प्राप्त हुई थीं। वीसी मिश्र उस समय बार कौंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन के अलावा लीगल एजूकेशन कमेटी के चेयरमैन, बंगलौर लॉ यूनिवर्सिटी के फाउंडर मेंबर और चेयरमैन सहित करीब सात अति महत्वपूर्ण पदों पर थे।
हालांकि, छह सप्ताह की साधारण कैद की सजा को पीठ ने चार साल के लिए निलंबित कर दिया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण
तीन सदस्यीय पीठ के फैसले को सुप्रीमकोर्ट बार एसोसिएशन ने सुप्रीमकोर्ट में ही चुनौती दी। इस मामले को पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दिया गया। संविधान पीठ ने 17 अप्रैल 1998 को फैसला सुनाते हुए कहा कि सुप्रीमकोर्ट को अनुच्छेद 142 और 129 में प्राप्त शक्तियों के तहत वकालत का लाइसेंस निलंबित करने का आदेश देने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार राज्य बार कौंसिल या बार कौंसिल ऑफ इंडिया के पास है। यह निर्णय आने तक वीसी मिश्र की वकालत पर लगाए गए तीन साल के प्रतिबंध की अवधि बीत चुकी थी।
prayagraj news : VC Mishra
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