पूरे महाकुंभ तक पंचायती परंपरा के मुताबिक फैसले लिए जाएंगे। इसके लिए धर्म ध्वजा के पास ‘चेहरा-मोहरा’ स्थापित हुआ है। जूना अखाड़े के महंत रमेश गिरि के मुताबिक अखाड़ों के छावनी प्रवेश करते ही कार्यकारिणी का कार्यकाल पूरा मान लिया जाता है।
इसके बाद कुंभ मेले की पूरी व्यवस्था ‘चेहरा-मोहरा’ के जरिये होती है। कुंभ की व्यवस्थाएं देखने के लिए कार्यकारिणी बनती है। इसका संचालन प्रधान करते हैं। चेहरा-मोहरा में सभी महंत बैठकर आवश्यक निर्णय लेते हैं। कुंभ में ही यह स्थापित होता है। महाकुंभ समापन के पहले अष्टकौशल बनाए जाएंगे। इनका कार्यकाल अगले छह साल का रहेगा।
अखाड़ों में भी चलता है पंचायती राज
अखाड़ों में अहम निर्णय पंचों के माध्यम से होता है। इसी वजह से पंचायती अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा, श्रीशंभू पंचायती अटल अखाड़ा, तपोनिधि पंचायती श्रीनिरंजनी अखाड़ा, पंचायती अखाड़ा आनंद के नाम से पहले पंचायती शब्द जुड़ा हुआ है। निरंजनी अखाड़ा के महंत शिव वन के मुताबिक अखाड़ों की परंपरा में आम सहमति से निर्णय लिए जाने की परंपरा रही है। सभी कार्य और निर्णय पारदर्शी तरीके से लिए जाते हैं। खास तौर से शिकायत मिलने पर किसी संन्यासी के खिलाफ कार्रवाई पंचायत के माध्यम से ही होती है।