इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पुस्तक के जरिये धार्मिक पुस्तक का अपमान करने के आरोपी संपादक को राहत देने से इन्कार कर दिया। कहा कि डिस्चार्ज आवेदन पर विचार करने के दौरान ट्रायल कोर्ट सिर्फ यह देखता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पुस्तक के जरिये धार्मिक पुस्तक का अपमान करने के आरोपी संपादक को राहत देने से इन्कार कर दिया। कहा कि डिस्चार्ज आवेदन पर विचार करने के दौरान ट्रायल कोर्ट सिर्फ यह देखता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। केस डायरी और जांच के दौरान एकत्र सामग्री में आरोपी के विरुद्ध पर्याप्त आधार मौजूद हैं। ऐसे में डिस्चार्ज आवेदन को निरस्त करने के आदेश में कोई अवैधता नहीं है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सुभाष चंद्र शर्मा की एकल पीठ ने आपराधिक पुनरीक्षण अर्जी खारिज कर दी।
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2004 में गाजीपुर के करंडा थाने में यशू जी महाराज और अन्य के खिलाफ विवादित पुस्तक प्रकाशित करने के मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आरोप था कि पुस्तक समाज में धार्मिक विद्वेष फैलाने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से प्रकाशित की गई थी। विवेचना के दौरान पुलिस ने पाया कि इस पुस्तक का संपादन मदन गोपाल सिन्हा ने किया था। प्रकाशन वाराणसी के संजय पुस्तक भंडार से हुआ था। ट्रायल कोर्ट की ओर से डिस्चार्ज आवेदन को खारिज किए जाने के खिलाफ याची ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण अर्जी दायर की।
अधिवक्ता ने दलील दी कि मदन गोपाल सिन्हा को केवल पुस्तक पर संपादक के रूप में नाम होने के आधार पर गलत तरीके से फंसाया गया है। उनके खिलाफ कोई ठोस सामग्री उपलब्ध नहीं है। अपर शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि पुलिस ने ऐसी कई पुस्तकें बरामद की हैं, जिनमें पुनरीक्षणकर्ता को संपादक के रूप में दर्शाया गया है। इन पुस्तकों की सामग्री स्पष्ट रूप से किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली है।