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संगम की रेती पर मोक्ष की राह बनाने में जुटे पांच लाख लोग

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प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में मकर संक्रांति के एक दिन पहले मंगलवार को बड़ी संख्या में श्रद्धा - फोटो : CITY DESK
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रेती पर कल्पवास के जरिए भक्त और भगवान के मिलन की अनूठी साधना
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शिविरों में समृद्धि के प्रतीक के रूप में उगाया गया जौ का बिरवा ,तुलसी-शालिग्राम की भी स्थापना
प्रयागराज। मोक्ष के लिए कल्पवास की धारणा संगम की रेती पर लाखों लोगों को खींच लाई है। अंत:करण और शरीर की शुद्धता के साथ ही मुक्ति का मार्ग तैयार करने में जुटे इन कल्पवासियों की कठिन साधना देखते रह जाएंगे। इनकी दिनचर्या और कड़े नियमों का पालन हर किसी के बूते की बात नहीं। जोगिया रंग में रंगे गृहस्थ शिविरों में कहीं मनका फेर रहे हैं तो कहीं हरि चरणों के ध्यान में लीन हैं। कल्पवासी शिविरों पर आध्यात्मिक संस्कृति का यह रंग प्रयागराज में माघ मेला की सदियों पुरानी परंपरा को साकार कर रहा है।
कई शिविरों में मंगलवार को मकर संक्रांति से पहले कल्पवास की शुरुआत तुलसी का पौधा रोपकर शालिग्राम की स्थापना और पूजा से हुई। सुख, समृद्धि और कल्याण के प्रतीक केतौर पर कल्पवासियों ने अपने शिविरों के बाहर जौ के बीज रोपे। महीने भर कल्पवास पूरा होने पर जौ की लहलहाती जरई को कल्पवासी अपने साथ ले जाएंगे। जबकि, तुलसी का पौधा गंगा में प्रवाहित कर दिया जाएगा। कल्पवासियों के सिर्फ वेश ही अलग नहीं उनकी पूरी दिनचर्या ही अलग है।
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काली मार्ग दक्षिण पटरी पर कल्पवास कर रहे गोपीगंज के पट्टर पांडेय महीने भर के लिए वस्त्र भी रंगा लिया है। वह जोगिया रंग वाले अंगौछे और गंजी में कल्पवास कर रहे हैं। वह बताते हैं ति के दौरान साफ सुथरे श्वेत वस्त्रों को धारण करना चाहिए। कल्पवास के दौरान पीले या सफेद रंग के ही साफ-सुथरे वस्त्रों का इस्तेमाल करना चाहिए। तीन बार गंगा स्नान और एक बार बिना नमक का भोजन कर वह प्रभु का ध्यान कर रहे हैं। उनका मानना है कि इस तरह कल्पवास से अपने अंत:करण एवं शरीर दोनों का कायाकल्प किया जा सकता है।
प्रतापगढ़ के रामनारायण मिश्र बताते हैं कि एक माह तक चलने वाले कल्पवास के दौरान वह जमीन पर ही सोते हैं। इस दौरान फलाहार, एक समय आहार या कभी विशेष पर्र्वों पर निराहार भी रहना पड़ता है। उनके मुताबिक कल्पवास करने वाले व्यक्ति को नियमपूर्वक तीन समय गंगा स्नान और यथासंभव भजन-कीर्तन, हरि चर्चा और लीलाओं का दर्शन करना चाहिए। यह उनका सातवां साल है। वह बताते हैं कि संगम तट पर कल्पवास के दौरान भक्त और भगवान का मिलन भी किसी न किसी रूप में होता है। प्रयागवाल तीर्थपुरोहित सभा के महामंत्री राजेंद्र पालीवाल के अनुसार अरैल से नागवासुकि के बीच 2500 बीघा क्षेत्रफल में बसे तंबुओं के शिविरों में इस बार पांच लाख से अधिक लोग मोक्ष की कामना से कल्पवास कर रहे हैं।
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कल्पवास के 21 नियम
पद्म पुराण में महर्षि दत्तात्रेय ने कल्पवास के नियमों का उल्लेख किया है। पद्म पुराण के अनुसार कल्पवासी को 21 नियमों का पालन करना चाहिए। ये नियम हैं सत्य बोलना, अहिंसा, इंद्रियों का शमन, प्राणियों पर दया -भाव, ब्रह्मचर्य का पालन, व्यसनों का त्याग, सूर्योदय से पूर्व शैय्या-त्याग, प्रतिदिन तीन पहर गंगा स्नान, त्रिकाल संध्या, पितरों का पिंडदान, दान, जप, सत्संग, क्षेत्र संन्यास अर्थात संकल्पित क्षेत्र के बाहर न जाना, परनिंदा त्याग, साधु -संयासियों की सेवा, जप एवं संकीर्तन, एक समय भोजन, भूमि शयन, अग्नि सेवन न कराना। कल्पवास में सबसे ज्यादा महत्व ब्रह्मचर्य, व्रत एवं उपवास, देव पूजन, सत्संग, दान का है।
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