इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पेट्रोल पंप की डीलरशिप के लिए जारी अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) को उस व्यक्ति को सुने बिना रद्द नहीं किया जा सकता, जिसकी उम्मीदवारी प्रभावित होती हो। ऐसा करना प्राकृतिक न्याय सिद्धांत का उल्लंघन है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने पीयूष कुमार आनंद की याचिका निस्तारित कर दी। कोर्ट ने बिजनौर के डीएम की ओर से जारी एनओसी रद्द करने वाले आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही डीएम, एडीएम प्रशासन को याची और तेल कंपनी को नए सिरे से सुनवाई का अवसर देते हुए चार हफ्ते में फैसला लेने का आदेश दिया है।
तेल कंपनी इंडियन ऑयल ने पेट्रोल पंप की डीलरशिप के लिए याची की उम्मीदवारी का सत्यापन किया था। इसके बाद प्रशासन से एनओसी मांगा गया, जिसे जारी भी कर दिया गया। हालांकि, अपर जिलाधिकारी (एडीएम) ने दो अप्रैल को बिना याची को सुने एनओसी निरस्त कर दिया। इससे उसकी डीलरशिप की उम्मीदवारी भी प्रभावित हो गई। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
राज्य सरकार के अधिवक्ता ने दलील दी कि पेट्रोल पंप के लिए प्रस्तावित भूमि पहले सरकारी अनुदान अधिनियम के तहत कार्रवाई से संबंधित है। इसलिए एनओसी रद्द किया गया है। इस पर कोर्ट ने कहा कि भूमि को लेकर कोई आपत्ति थी। इसके बावजूद अगर एनओसी जारी कर दिया गया है तो उस व्यक्ति को सुनना आवश्यक था, जिसने डीलरशिप के लिए उस भूमि की पेशकश की है। बिना सुनवाई का अवसर दिए एकतरफा एनओसी रद्द करना प्राकृतिक न्याय के विपरीत है। कोर्ट ने एनओसी रद्द करने वाला आदेश रद्द कर मामला अपर जिलाधिकारी के पास दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।