याचिका में कहा गया था कि अली आपराधिक मामलों को लेकर नैनी जेल में निरुद्ध है। उन मुकदमों के संदर्भ में संबंधित अदालतों में पेशी के दौरान उस पर जानलेवा हमला हो सकता है। इसलिए उनकी पूरी सुरक्षा करने या उनकी पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कराने का आदेश दिया जाए। राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता आशुतोष कुमार ने याचिका का विरोध करते हुए कोर्ट का ध्यान अली के हलफनामे में उन तथ्यों की ओर आकृष्ट कराया था, जिनमें अली ने अपने मरहूम पिता व चाचा की आपराधिक छवि का हवाला दिया है।
आशुतोष कुमार ने कहा था कि दोनों याचियों के हलफनामे में उनके पिता अतीक अहमद व चाचा खालिद अजीम उर्फ अशरफ की आपराधिक छवि और आतंक का हवाला दिया गया है। कहा गया है कि कैसे वे दोनों अपराध के दलदल में धंसते चले गए और उनका कितना आतंक कायम था। साथ ही उन्होंने याचिका के साथ संलग्न हलफनामे में शपथकर्ता की एक गलती को दर्शाते हुए कहा था कि सरसरी तौर पर तैयार कराए गए हलफनामों से स्पष्ट है कि याचियों की आशंका काल्पनिक है। इस पर उमर व अली के वकीलों ने उसे टाइप की गलती बताया था।