इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत एकेडमिक रिसोर्स पर्सन (एआरपी) के रूप में कार्यरत शिक्षकों को नई चयन प्रक्रिया से बाहर करने वाली नीति को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की अदालत ने दिलीप कुमार सिंह राजपूत व अन्य की याचिकाओं पर दिया है।
गौरतलब है कि एआरपी का शुरुआती कार्यकाल एक वर्ष व कार्य प्रकृति के अनुसार नवीनीकरण जो अधिकतम तीन वर्ष होगी, निर्धारित किया गया है, जबकि याचीगण पिछले पांच वर्षों से एआरपी के रूप में कार्यरत हैं। अब सरकार ने नई नियुक्ति करने का फैसला लिया है जिसमें तीन वर्ष कार्य कर चुके लोगों को चयन के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया है। याचियों ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। दलील दी गई कि उन्हें भले ही चयनित होने का अधिकार नहीं है, लेकिन चयन प्रक्रिया में शामिल होना उनका अधिकार है।
उन्हें इससे वंचित करना अनुच्छेद 14व 16का उल्लंघन है। कोर्ट ने इसे सरकार का नीतिगत मामला मानते हुए हस्तक्षेप से इंकार कर दिया। कहा कि बच्चों में भाषाई व गणितीय कौशल बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत आदर्श विद्यालय विकसित करने की सरकार की नीतिगत योजना में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि तीन वर्ष तक काम कर चुके अध्यापकों को विद्यालयों में वापस भेज अनुभव का लाभ लेना और नये अध्यापकों को एआरपी बनने का अवसर देना किसी प्रकार से विभेदकारी व मनमानापन नहीं है।