इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मृत कर्मचारी की सर्विस बुक और अन्य सरकारी दस्तावेजों में बेटे के रूप में दर्ज व्यक्ति के दावे को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह जैविक पुत्र नहीं है या गोद लिए जाने का प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मृत कर्मचारी की सर्विस बुक और अन्य सरकारी दस्तावेजों में बेटे के रूप में दर्ज व्यक्ति के दावे को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह जैविक पुत्र नहीं है या गोद लिए जाने का प्रमाण उपलब्ध नहीं है। कोर्ट ने विभाग को छह सप्ताह के भीतर याची के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।
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यह आदेश मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने जौनपुर निवासी मोहम्मद अली की याचिका स्वीकार करते हुए दिया है। मामले के अनुसार अनवर अली रेलवे विभाग में सफाईकर्मी थे। नौ मई 2014 को सेवा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी। परिवार में पत्नी, तीन विवाहित बेटियां और एक नाबालिग बेटा था। बालिग होने के बाद याची की मां ने बेटे के लिए अनुकंपा नियुक्ति की मांग की लेकिन विभाग ने अक्तूबर 2018 को आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद मामला अधिकरण और फिर हाईकोर्ट पहुंचा। विभाग ने दावा किया कि जांच में सामने आया कि याची अनवर अली का जैविक पुत्र नहीं है।
विभागीय रिपोर्ट के अनुसार अनवर अली को वह बच्चा ट्रेन में मिला था। वह मृत कर्मचारी अनवर अली का कानूनी रूप से गोद लिया हुआ बेटा साबित नहीं हुआ। दूसरी ओर, याची ने हाईकोर्ट में बताया कि हाईस्कूल की अंकतालिका, जन्म प्रमाणपत्र, परिवार रजिस्टर, आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड में उसे अनवर अली का बेटा दर्ज किया गया है। कोर्ट के पूछने पर विभाग ने यह भी स्वीकार किया कि सर्विस बुक में भी याची को अनवर अली का बेटा दर्ज किया गया था। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए विभाग के रवैये पर नाराजगी जताते हुए याची को 25 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।