इसमें गंगा इलेक्ट्रिकल और मेसर्स प्रभावती इलेक्ट्रिकल वर्क्स ने हिस्सा लिया। इस बार भी गंगा इलेक्ट्रिकल को ही अर्ह माना गया। इस बार भी तीन निविदा न आने की वजह से स्वच्छ प्रतिस्पर्धा के लिए तीसरी बार टेंडर कराया गया। इस बार भी इन्हीं दो फर्मों ने निविदा डाली।
इसमें भी गंगा इलेक्ट्रिकल को अनुमन्य करार देते हुए प्रभावती इलेक्ट्रिकल वर्क्स को लिक्विड एसेट्स न होने के कारण रेस से बाहर कर दिया गया। अरुण मिश्रा की ओर से लोकायुक्त से की गई शिकायत में कहा गया था कि एक ही फर्म को लाभ पहुंचाने के लिए पीडीए के तत्कालीन मुख्य अभियंता मनोज मिश्र की ओर से ऐसा कराया गया।
कई वर्ष से वहां एक ही फर्म को अलग-अलग निविदाओं के जरिए कार्य आवंटित किए जाने पर उंगली उठाई गई। लोकायुक्त के निर्देश पर मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत ने इस मामले की जांच के लिए संयुक्त निदेशक कोषागार, मुख्य अभियंता लोक निर्माण विभाग और अपर आयुक्त प्रशासन की तीन सदस्यीय जांच टीम गठित की। इस जांच कमेटी की रिपोर्ट में गड़बड़ी सामने आई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि तीसरी पर कराई गई निविदा में दो फर्में अर्ह पाई गईं, लेकिन एक ही वित्तीय निविदा नहीं खोली गई। जबकि, दोनों फर्मों की वित्तीय निविदा खोली जानी चाहिए थी। तीन निविदा प्राप्त होने की दशा में ही टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के नियम का भी अनुपालन नहीं किया गया। ऐसे में इस टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता परिलक्षित होती है।