इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) में परीक्षा नियंत्रक कार्यालय इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। पूर्व में परीक्षा की कॉपियों को बेचने और 22 दैनिक वेतन भोगी कर्मियों को भुगतान किए जाने में हुई गड़बड़ी सामने आने के बाद अब इस पूरे मामले में पूर्व परीक्षा नियंत्रक प्रो. एचएस उपाध्याय पर अंगुली उठ रही है। हालांकि प्रो. उपाध्याय ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उनके खिलाफ कुछ लोग साजिश कर रहे हैं।इविवि के पीआरओ डॉ. चितरंजन कुमार सिंह भी मान रहे हैं कि पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा नियंत्रक कार्यालय में लगातार गड़बड़ियां हुईं। इविवि में हर साल परीक्षाएं होती हैं और बाद में रद्दी कॉपियां बेच दी जाती हैं। इस साल कॉपियां बेचने पर इविवि को 12 लाख नौ हजार 640 रुपये की आय हुई है
जबकि पिछले कुछ वर्षों में कभी तीन तो कभी चार लाख रुपये की आय होती रही है जबकि इविवि में छात्रों की संख्या में कोई विशेष बढ़ोतरी नहीं हुई है और कॉपियां भी लगभग उतनी ही उपयोग में आईं, जितनी पूर्व के वर्षों में प्रयोग में आती रही हैं। ऐसे में रद्दी कॉपियों की नीलामी प्रक्रिया में गड़बड़झाला साफ नजर आ रहा है। इस बार नीलामी की प्रक्रिया में परिवर्तन किए गए और इसका फायदा भी हुआ।
इसके अलावा पूर्व परीक्षा नियंत्रक प्रो. एचएस उपाध्याय पर यह आरोप भी है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में 22 लोगों को दैनिक वेतन पर रखा था। इसमें से दो कर्मचारी विश्वविद्यालय में एलएलबी के छात्र थे। विश्वविद्यालय में अध्ययनरत छात्र परीक्षा नियंत्रक जैसे अति गोपनीय कार्यालय में कैसे कार्य कर सकते हैं, इस पर सवाल उठ रहे हैं। इसके अलावा एक कर्मचारी के प्रवेश पर आठ जून 2016 को तत्कालीन रजिस्ट्रार ने बैन लगाया था, इसके बावजूद वह कर्मचारी 31 जुलाई 2018 तक परीक्षा नियंत्रक कार्यालय में आता रहा और 22 लोगों के साथ उसने भी भुगतान प्राप्त किया।
मैंने कार्यपरिषद के निर्णय का किया अनुपाल : प्रो. उपाध्याय
इस बारे में पूर्व परीखा नियंत्रक प्रो. एचएस उपाध्याय का कहना है कि उन्होंने केवल कार्य परिषद के निर्णय का अनुपालन किया। कार्य परिषद ने ही दैनिक वेतन भोगी कर्मियों को कार्य विस्तार और उन्हें भुगतान की मंजूरी थी। प्रो. उपाध्याय के अनुसार उन्हें जब रजिस्ट्रार पद का अतिरिक्त प्रभारी सौंपा गया था तो उन्होंने कार्य परिषद के निर्णय का अनुपालन करते हुए भुगतान का आदेश दिया। कर्मचारियों की नियुक्ति से उनका कोई लेनादेना नहीं है। जहां तक रद्दी कॉपियों को बेचने को बेचे जाने का मामला है तो परीक्षा नियंत्रक के पास किसी भी तरह का कोई वित्तीय अधिकार नहीं है। इस बार रद्दी कॉपियों को बेचने के लिए जो कमेटी बनी थी, वह उसके अध्यक्ष थे और बिड उन्होंने ही तय की थी। रद्दी की निलामी पूरी तरह से संपत्ति अधिकारी की देखरेख में होती है। परीक्षा नियंत्रक का इससे कोई लेनादेना नहीं।