याची ने पूरक अरोप पत्र और तलबी आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। याची के अधिवक्ता का कहना था कि याची के विरूद्घ दाखिल पूरक आरोप पत्र संबंधित मजिस्ट्रेट की पूर्वानुमति के बिना पुलिस द्वारा की गई अग्रिम विवेचना का परिणाम है। विवादित समझौता विलेख में याची का नाम गवाह के रूप में लिखा गया है, जबकि उस पर याची का हस्ताक्षर नहीं है। विवादित मकान पर न तो याची का कब्जा और न ही विवादित समझौता के आधार पर याची स्वामित्व का दावा कर रहा है। विवादित समझौता विलेख का लाभार्थी और सम्पत्ति का कब्जेदार नरेंद्र कुमार सिंह ही है।
मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने दो विधिक बिन्दु पर महत्वपूर्ण विचार प्रकट किया। पहला यह कि मामले की सच्चाई उजागर करने के लिए विवेचना करना पुलिस का अधिकार है। कानूनी व्याख्या के अनुसार अग्रिम विवेचना के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्वानुमति की कानूनी बाध्यता नहीं है। दूसरे विधिक बिन्दु को स्पष्टï करते हुए न्यायालय ने कहा कि संपत्ति की बिक्री के लिए निष्पादित समझौता विलेख, संपत्ति मेें स्वामित्व का अधिकार नहीं प्रदान करता।
उक्त विधि व्यवस्था निर्धारित करतेे हुए उच्च न्यायालय ने याची की याचिका को स्वीकार करते हुए विवादित सम्पत्ति का लाभार्थी नहीं माना और धोखाधड़ी के आरोप में दाखिल पूरक आरोप पत्र और विचारण न्यायालय द्वारा जारी तलबी आदेश को रद्ïद कर दिया।