कौड़िहार/नवाबगंज (इलाहाबाद)। छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सली हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवान मुकेश कुमार का पार्थिव शरीर बुधवार को नवाबगंज के बजहा स्थित उसके गांव डिहवा पहुंचा तो ग्रामीणों की आंखों में आंसू तो थे ही आक्रोश भी था। लोगों ने सरकार और प्रशासन के उदासीनतापूर्ण रवैये को लेकर खुल कर विरोध जताया और अंतिम संस्कार नहीं होने दिया। मोर्चा महिलाओं ने संभाला था।
डीएम भवनाथ, एसएसपी दीपक कुमार उन्हें मनाने पहुंचे लेकिन बात नहीं बनी। ग्रामीण मुख्यमंत्री को बुलाने, 50 लाख रुपये मुआवजा देने, परिवार के एक सदस्य को नौकरी, मकान को पक्का कराने, दो एकड़ जमीन और स्मारक बनवाने की मांग पर अड़े थे। डीएम ने अपने स्तर से मकान, जमीन और स्मारक जैसी मांगों को पूरा करने का आश्वासन दिया लेकिन महिलाओं ने शव नहीं उठने दिया। रात में अंतिम सलामी देकर सीआरपीएफ और पुलिस के जवान लौट आए।
मुकेश कुमार का शव बुधवार दोपहर सारनाथ एक्सप्रेस से जंक्शन स्टेशन पर पहुंचा था। रायपुर से कांस्टेबल सर्वंत कुमार पासवान साथ था। सीआरपीएफ के कमांडेंट यूबी मिश्रा, जीएस चंदेल शहीद को कंधा देने के लिए जंक्शन पहुंचे। अफसर सीआरपीएफ के ट्रक में पूरे सम्मान के साथ शहीद के पार्थिव शरीर को लेकर डिहवा गांव स्थित घर पर पहुंचे। शहीद का पार्थिव शरीर दोपहर 3.30 बजे जैसे ही गांव पहुंचा ग्रामीणों की आंखें नम हो गईं। घर के बाहर हजारों की संख्या में महिलाएं भी पहुंच गईं।
पार्थिव शरीर को कुछ देर घर पर रखा गया। आम लोगों के दर्शन के लिए 500 मीटर दूर प्राइमरी स्कूल ले जाने की तैयारी होने लगी तो मुकेश के पिता पृथ्वीपाल, बहनें संगीता, अनीता, मनीता, मनीषा, मां प्रभावती और दादी वहां चले गए। डीएम और एसएसपी भी स्कूल पहुंच गए थे तभी खबर आई कि महिलाएं शव को नहीं उठने दे रहीं। उन्हें गांव तथा क्षेत्र के कई नेताओं का समर्थन भी हासिल था। यह जानकारी मिलते ही डीएम वापस शहीद के घर पहुंचे तो ग्रामीणों ने मांगों से संबंधित पत्र सौंप दिया। जिन मांगों को जिला स्तर से पूरा किया जा सकता था, उसके निस्तारण का डीएम ने तत्काल आश्वासन दिया।
पट्टा दिलाने, स्मारक और मकान को पक्का कराने के लिए उन्होंने अफसरों को निर्देश दिए। करीब डेढ़ घंटे बाद शाम को पांच बजे महिलाएं शांत हुईं और शव को स्कूल भेजा गया। यहां सीआरपीएफ के 12 और उत्तर प्रदेश पुलिस के 12 जवानों ने अंतिम सलामी दी। तब तक अंधेरा हो चुका था। जब अंतिम संस्कार की बात शुरू हुई तो फिर से सीएम को बुलाने की मांग पर अड़ गए।
अफसरों के लौट जाने के बाद भी परिजनों से बातचीत का सिलसिला खत्म नहीं हुआ। प्रशासनिक अफसरों ने शहीद के पिता पृथ्वीपाल से बात की। जिलाधिकारी भवनाथ ने शहीद के परिजनों की मंशा से मुख्यमंत्री को अवगत करा दिया है। वह संतुष्ट हैं। रात हो जाने के कारण अंतिम संस्कार नहीं हो सका। परिजनों ने आश्वासन दिया है कि बृहस्पतिवार सुबह शृंगवेरपुर घाट पर अंतिम संस्कार किया जाएगा।
डीएम ने आश्वासन दिया कि राज्य सरकार ने परिजनों को 20 लाख रुपये देने का आश्वासन दिया है। घरवालों को चेक सीएम अखिलेश यादव के हाथों ही दिलवाया जाएगा। जब गतिरोध बना रहा तो प्रशासन, पुलिस और सीआरपीएफ के अफसर लौट आए। परिजन शव वापस घर ले गए।
शहीद के घर दो दिन तो कोई झांकने नहीं आया लेकिन बुधवार को नेताओं को मजमा लगा गया। पूर्व केंद्रीय मंत्री रामपूजन पटेल, विधायक अंसार अहमद, सत्यवीर मुन्ना, एमएलसी सूरजभान करवरिया, पूर्व विधायक प्रभाशंकर पांडेय, बाबू लाल भंवरा, शिव प्रसाद मिश्र, पूर्व सांसद धर्मराज पटेल, मुकुंद तिवारी, जवाहर पटेल, कन्हैया लाल पांडेय शहीद के घर पहुंचे।
शहीद के शव को जैसे ही उठाया जाने लगा, महिलाओं ने मोर्चा लगा दिया। सैकड़ों की तादात में जुटीं महिलाओं ने शहीद के घर को घेर लिया। कहा कि जब तक मुख्यमंत्री नहीं आते, अंतिम संस्कार नहीं होगा। गांव के कुछ बुजुर्गों ने महिलाओं को समझाने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। देर रात तक ग्रामीणों का मजमा शहीद के घर पर लगा हुआ था।