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निराले अंदाज में हुई नया उदासीन की पेशवाई, इष्टदेव भगवान श्रीचंद्र जी ने की अगुवाई

Fri, 11 Jan 2019 02:01 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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peshwai Udasin
संगम की रेती पर फिर दिखा संतों का शाही अंदाज। बृहस्पतिवार को श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन के संत पेशवाई निकालकर संगम की रेती स्थित छावनी में पहुंचे। हाथी, घोड़े, ऊंट, बैंडबाजा आदि के साथ भगवान श्री चंद्र जी की पालकी और ध्वज-पताकाओं के साथ सजे हुए रथों पर अखाड़े के श्रीमहंत और महामंडलेश्वर विराजे। हालांकि धर्मध्वजा के साथ ही अखाड़े में इष्टदेव भगवान श्रीचंद्र जी का सूक्ष्म रूप से पहरा आरंभ हो गया था। मुट्ठीगंज स्थित मुंशीराम की बगिया से धूमधाम से निकली अखाडे़ की पेशवाई सुलाकी, रामभवन, बताशा मंडी, बहादुरगंज, कीडगंज से निकलकल नया पुल को पार करते हुए मेला दफ्तर के सामने पहुंची। यहां संतों के भव्य स्वागत के बाद सभी पांटून पुल पार करके त्रिवेणी मार्ग स्थित छावनी पहुंची। यहां अखाड़े के देवता और निशान स्थापित किए गए। संतों ने धर्मध्वजा की परिक्रमा और पूजा की। अब पूरे पर्व यहीं पर संतों का डेरा जमेगा। 
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पेशवाई में फूलों से सजे तकरीबन चालीस रथों पर महामंडलेश्वर और श्रीमहंत विराजे। इसमें महामंडलेश्वर डॉ.रामप्रकाश शास्त्री, महामंडलेश्वर डॉ.गोपालदास दिगल्ला, महामंडलेश्वर सुरेश मुनि, महामंडलेश्वर कान्तानंद, महामंडलेश्वर रुद्रदेवानंद, महामंडलेश्वर प्रकाशानंद जी, महामंडलेश्वर ऋषिराज जी आदि शामिल थे। इसी तरह अखाड़े के श्रीमहंत शंकरदास जी, जखीरा प्रबंधक एवं मुखिया महंत भगतराम, मुखिया महंत मंगलदास जी, मुखिया महंत सुरजीत मुनि जी, अध्यक्ष महंत धूनिदास जी, सहायक सचिव त्रिवेणी दास जी, सचिव श्रीमहंत जगतार मुनि, मुखिया महंत भगतराम आदि भी पेशवाई में चले।
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पेशवाई - फोटो : अमर उजाला, प्रयागराज
नया उदासीन के भगवान श्रीचंद्र और संतों का जगह-जगह भव्य स्वागत किया गया। पूरे रास्ते शहरियों ने रथ को रोककर आरती पूजन और माल्यार्पण किया। पेशवाई के मेला दफ्तर के सामने से गुजरने पर मेलाधिकारी विजय किरन आनन्द, डीआईजी केपी सिंह के अतिरिक्त प्रशासन एवं पुलिस के अधिकारियों ने माल्यार्पण करके संतों का स्वागत किया। रास्ते भर शहरियों की ओर से संतों के लिए जलपान आदि की व्यवस्था भी की गई थी।
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पेशवाई - फोटो : अमर उजाला, प्रयागराज
पेशवाई में तंगतोड़ा नागा निर्वाण साधु भी शामिल हुए लेकिन वे वस्त्रधारी थे। परंपरा के संरक्षक और संवाहक की भूमिका में उन्होंने अखाड़े के निशान और प्रतीकों के साथ पेशवाई में शिरकत करते हुए स्वयं अपनी महिमा बखानी। पेशवाई का उनका अलग अंदाज रहा।
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